ZARKHEZ

Top 10 of ZARKHEZ

    वो एक लम्हा जो बेदारियों का ज़ामिन है
    जब आँख लगने लगे तब अज़ान देता है
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    हमारी आँख में पहले तो मिट्टी झोंक जाएँगे
    वही फिर काँच के आँसू इकट्ठे करने आएँगे

    अगर ज़ाहिर करूँगा आसमाँ पर ख़्वाहिशें अपनी
    मुझे इस बात का डर है सितारे टूट जाएँगे
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    तू भी गर बे-वफ़ाई कर जाए
    तो मेरा क़र्ज़ ही उतर जाए

    ख़ुद-कुशी की सहूलतें तब हैं
    जब कोई हादसा गुज़र जाए

    ज़िन्दगी एक शाहज़ादी है
    शाहज़ादी का दिल न भर जाए

    मैं अगर ज़ब्त करने पर आऊँ
    तिश्नगी तिश्नगी से मर जाए

    वस्ल उस कैफ़ियत में लाज़िम है
    जब हवस का नशा उतर जाए

    या उभर आए आज वो सूरत
    या मेरे हाथ से हुनर जाए

    फिर किसी हुस्न की इनायत हो
    फिर कोई सानेहा गुज़र जाए

    हसरतों से छलक रहा है दिल
    कोई ये जाम ख़ाली कर जाए
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    अगर ज़ाहिर करूँगा आसमाँ पर ख़्वाहिशें अपनी
    मुझे इस बात का डर है सितारे टूट जाएँगे
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    हर एक सम्त से देखूँ तुम्हें किसे मालूम
    उदासियों का नया ज़ाविया निकल आए
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    सर्द रुतों की रंगत जब चारों जानिब बढ़ जाती है
    इक कश्मीरन पश्मीना की शॉल बेचने आती है

    लोग ये इक जुमला दोहरा कर मुझ से कटते जाते हैं
    दिल का अच्छा शख़्स है लेकिन थोड़ा सा जज़्बाती है

    उस से बिछड़े एक ज़माना गुज़र गया पर ख़्वाबों में
    अक्सर वो मेरे शाने पर सर रख कर सो जाती है

    मुझ को अपनी ज़ात से वहशत होती है जब देखता हूँ
    धूप तेरा चेहरा कितनी आसानी से छू आती है

    एक मुहब्बत है जिस का इज़हार नहीं होता मुझ से
    एक मसाफ़त है जो मुझ से ख़त्म नहीं हो पाती है

    एक ख़ुशी होंठों पे जो आने से है महरूम मेरे
    एक उदासी है जो मुझ
    में रक़्स नहीं कर पाती है

    कभी तो उस के छूने भर से ऐसे करिश्में होते हैं
    शाख़-ए-दिल पर पतझड़ के मौसम में कोपल आती है

    रफ़्ता रफ़्ता टूट रहे हैं गुंबद उस की यादों के
    धीरे धीरे दिल की दिल्ली सूनी होती जाती है

    इतने पेच-ओ-ख़म होते हैं कुछ लोगों के जीवन में
    इक लम्हा भी ग़ौर करो तो हैरानी बढ़ जाती है

    कल किस की आग़ोश में गुज़री थी मेरी आवारा शब
    ये किस के बिस्तर की ख़ुशबू मेरे बदन से आती है

    मैं समझा था ये चिंगारी मुझ को राख बना देगी
    लेकिन ये लड़की तो मेरी फ़ितरी आग बुझाती है

    मुझ से वस्ल के लम्हों में भी कैसा शल है उस का बदन
    आग के छूने से तो सुना था हर इक शय जल जाती है

    ला-हासिल चेहरों के यूँ ही ख़्वाब न देखा कर 'ज़रख़ेज़'
    ये वो इमारत है जो आँखें खुलते ही ढह जाती है
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    मैं तुम्हें अपनी हसरतें दूँगा
    उन को अरमान तुम बना लेना
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    सैकड़ों मील की थकन जैसे
    नीम की छाँव से चली जाए

    लाख शिकवे गिले थे दुनिया से
    फिर मेरी ज़िंदगी में तुम आए
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    "शर्तें"
    वो एक लम्हा
    जो उस की मेरी
    अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था
    हमारी दोनों की ज़िन्दगी था

    अजीब शर्तों पे जल रहा है
    वो लम्हा करवट बदल रहा है

    वो कह रही है
    कि मुझ से मिलने की आरज़ू तुम
    जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो
    कि साँस लेने में मुश्किलें हों
    तो मुझ को आ कर गले लगाना
    और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना

    लिहाज़ा इक दिन
    मैं जैसे तैसे
    तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला
    छुड़ाने निकला
    तो भेद जाना
    किसे ख़बर थी
    कि मेरी साँसें
    जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी
    तो उस की शर्तें नकार देंगी

    वो एक लम्हा
    जो उस की मेरी
    अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था
    हमारी दोनों की ज़िन्दगी था

    हलाक शर्तों को कर गया है
    किसी अँधेरे में मर गया है
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