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ZARKHEZ shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in ZARKHEZ's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये तिरे हिज्र का करिश्मा है मैं ने काटा जो साल दिन भर में — ZARKHEZ
उन दरख़्तों से दूर हो जाओ जिन दरख़्तों में छाँव होती है — ZARKHEZ
हर एक सम्त से देखूँ तुम्हें किसे मालूम उदासियों का नया ज़ाविया निकल आए — ZARKHEZ
मैं तुम्हें अपनी हसरतें दूँगा उन को अरमान तुम बना लेना — ZARKHEZ
जो हर्फ़ हर्फ़ जोड़ के लिखता रहा मुझे उस ने भी इक किताब में दफ़्ना दिया मुझे — ZARKHEZ
मैं अपने घर के सभी रास्तों को भूल गया तेरे बदन का हर इक तिल शुमार करते हुए — ZARKHEZ
फूल बिखरा दिए दरवेश ने हर कूचे में एक पत्थर भी किसी हाथ को हासिल न रहा — ZARKHEZ
आप की महफ़िल में सब थे ख़ामुशी पहने हुए मेरे आते ही तमाशा-गर तमाशा किस लिए — ZARKHEZ
वो एक लम्हा जो बेदारियों का ज़ामिन है जब आँख लगने लगे तब अज़ान देता है — ZARKHEZ
अगर ज़ाहिर करूँँगा आसमाँ पर ख़्वाहिशें अपनी मुझे इस बात का डर है सितारे टूट जाएँगे — ZARKHEZ
आ रहा है बहार का मौसम फूल निकलेंगे मेरे ज़ख़्मों से — ZARKHEZ
तुम्हें छूने को हूँ बेताब लेकिन हक़ीक़त हाथ में उलझी हुई है — ZARKHEZ

Ghazal

सर्द रुतों की रंगत जब चारों जानिब बढ़ जाती है इक कश्मीरन पश्मीना की शॉल बेचने आती है लोग ये इक जुमला दोहरा कर मुझ सेे कटते जाते हैं दिल का अच्छा शख़्स है लेकिन थोड़ा सा जज़्बाती है उस से बिछड़े एक ज़माना गुज़र गया पर ख़्वाबों में अक्सर वो मेरे शाने पर सर रख कर सो जाती है मुझ को अपनी ज़ात से वहशत होती है जब देखता हूँ धूप तेरा चेहरा कितनी आसानी से छू आती है एक मुहब्बत है जिस का इज़हार नहीं होता मुझ सेे एक मसाफ़त है जो मुझ सेे ख़त्म नहीं हो पाती है एक ख़ुशी होंठों पे जो आने से है महरूम मेरे एक उदासी है जो मुझ में रक़्स नहीं कर पाती है कभी तो उस के छूने भर से ऐसे करिश्में होते हैं शाख़-ए-दिल पर पतझड़ के मौसम में कोपल आती है रफ़्ता रफ़्ता टूट रहे हैं गुंबद उस की यादों के धीरे धीरे दिल की दिल्ली सूनी होती जाती है इतने पेच-ओ-ख़म होते हैं कुछ लोगों के जीवन में इक लम्हा भी ग़ौर करो तो हैरानी बढ़ जाती है कल किस की आग़ोश में गुज़री थी मेरी आवारा शब ये किस के बिस्तर की ख़ुशबू मेरे बदन से आती है मैं समझा था ये चिंगारी मुझ को राख बना देगी लेकिन ये लड़की तो मेरी फ़ितरी आग बुझाती है मुझ सेे वस्ल के लम्हों में भी कैसा शल है उस का बदन आग के छूने से तो सुना था हर इक शय जल जाती है ला-हासिल चेहरों के यूँँ ही ख़्वाब न देखा कर 'ज़रख़ेज़' ये वो इमारत है जो आँखें खुलते ही ढह जाती है — ZARKHEZ

Nazm

"द साइलेंट पैरट" हाट के दो राहे पर सुस्त राहगीरों को दिन की अफ़रा तफ़री में अपना जी लगाने को लोग ये बताते हैं आहनी सलाखों पर इक चमकती तख़्ती है जिस पे साफ़ लिक्खा है इस क़फ़स के सब तोते अपनी अपनी मर्ज़ी के गीत गुनगुनाते हैं नीचे एक चौकी है जिस में बूढ़ा रखवाला गीत पूरा होते ही तालियाँ बजाता है अपने क़ैदी तोतों का हौसला बढ़ाता है रोज़ शाम होते ही ये तमाशा लगता है तोते एक इक कर के बूढ़े की दिलेरी के उस क़फ़स की अज़मत के गीत गुनगुनाते हैं ये भी ध्यान रखते हैं गीत की कोई सरगम गीत की कोई परवाज़ आहनी सलाख़ों से हो न जाए बालातर आहनी सलाखों के उस ही क़ैद ख़ाने में एक और तोता है जो कभी निराला था गीत भी निराले थे बूढ़ा सुन के कहता था गीत ख़ूब होते हैं बस ख़याल ये रखना गीत की कोई सरगम गीत की कोई परवाज़ आहनी सलाख़ों से हो न जाए बालातर अब वो चुप ही रहता है गीत गा नहीं पाता चोंच ही हिलाता है चोंच ही हिलाता है और फिर भी वो बूढ़ा तालियाँ बजाता है हाट के दो राहे पर हाट के दो राहे पर — ZARKHEZ
"द लास्ट गुडबाय" शाम की ख़ामोशी में इज़्तिराब भरने को शोर पैदा करने को उस की कॉल आई है कह रही है वो मुझ से ठीक ही हुआ है सब ख़ुश बहुत हूँ शादी से आख़िरी दफ़ा लेकिन मुझ को तुम से मिलना है सोचता हूँ मैं कह दूँ आख़िरी दफ़ा देखो मिल चुका हूँ मैं पहले और अब के मिल कर भी क्या कहोगी तुम आख़िर फिर वही गिले शिकवे क्या कमी थी रिश्ते में क्यों जुदा हुए थे हम बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसी हो ज़िंदगी बसर कर लो पर मैं हामी भरता हूँ मैं उसे ये कहता हूँ हाँ मैं मिलने आता हूँ इक उदास कैफ़े में इक उदास कैफ़े में आ मिले हैं हम फिर से सामने वो बैठी है चाय पी रहे हैं हम चाय पीते देख उस को था अजब सुकूँ पहले था अजब सुकूँ पहले जब वो हँस के कहती थी मुझ को मिल गए हो तुम मुझ को मिल गया है सब चाय पी रही है वो और मैं ख़यालों में घिर चुका हूँ वहशत से वहशतों से घिर कर मैं सोचने लगा हूँ ये खो दिया उसे मैं ने खो दिया है मैं ने सब अब न चाहने पर भी उस से पूछ बैठा हूँ क्यों जुदा हुए थे हम क्या कमी थी पहले जो पूरी कर चुकी हो तुम आज भी तो देखो ना मेरे सामने हो तुम और वो हँस के कहती है बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसे हो ज़िंदगी बसर कर लो — ZARKHEZ
"ख़्वाबों का सौदागर" सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं — ZARKHEZ
"शर्तें" वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था अजीब शर्तों पे जल रहा है वो लम्हा करवट बदल रहा है वो कह रही है कि मुझ सेे मिलने की आरज़ू तुम जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो कि साँस लेने में मुश्किलें हों तो मुझ को आ कर गले लगाना और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना लिहाज़ा इक दिन मैं जैसे तैसे तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला छुड़ाने निकला तो भेद जाना किसे ख़बर थी कि मेरी साँसें जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी तो उस की शर्तें नकार देंगी वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था हलाक शर्तों को कर गया है किसी अँधेरे में मर गया है — ZARKHEZ