जो राहबर रहे हैंगुमराह कर रहे हैंकुछ कर मिरे मसीहाये ज़ख़्म भर रहे हैंये वक़्त मुंजमिद हैऔर हम गुज़र रहे हैंआईने इस सदी केचेहरों से डर रहे हैंला-फ़ानी हैं वो मौसमजो लम्हा भर रहे हैंहम हैं के इक बदन मेंमुद्दत से मर रहे हैंबिस्तर की सिलवटों सेमंज़र उभर रहे हैंजिस्मों के फूल 'ज़रखेज़'शबनम से तर रहे हैं— ZARKHEZ