जब हवा तेज़-तेज़ चलती थी
मेरे अंदर उमीद जलती थी
जान पड़ जाती ख़ुश्क दरिया में
बर्फ़ पर्वत की जब पिघलती थी
तब तअक़्क़ुब में साए होते थे
जब कभी रौशनी निकलती थी
चाँद सोता था ओढ़ कर बादल
चाँदनी करवटें बदलती थी
— ZARKHEZ
मेरे अंदर उमीद जलती थी
जान पड़ जाती ख़ुश्क दरिया में
बर्फ़ पर्वत की जब पिघलती थी
तब तअक़्क़ुब में साए होते थे
जब कभी रौशनी निकलती थी
चाँद सोता था ओढ़ कर बादल
चाँदनी करवटें बदलती थी
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