"द साइलेंट पैरट"
हाट के दो राहे पर
सुस्त राहगीरों को
दिन की अफ़रा तफ़री में
अपना जी लगाने को
लोग ये बताते हैं
आहनी सलाखों पर
इक चमकती तख़्ती है
जिस पे साफ़ लिक्खा है
इस क़फ़स के सब तोते
अपनी अपनी मर्ज़ी के
गीत गुनगुनाते हैं
नीचे एक चौकी है
जिस में बूढ़ा रखवाला
गीत पूरा होते ही
तालियाँ बजाता है
अपने क़ैदी तोतों का
हौसला बढ़ाता है
रोज़ शाम होते ही
ये तमाशा लगता है
तोते एक इक कर के
बूढ़े की दिलेरी के
उस क़फ़स की अज़मत के
गीत गुनगुनाते हैं
ये भी ध्यान रखते हैं
गीत की कोई सरगम
गीत की कोई परवाज़
आहनी सलाख़ों से
हो न जाए बालातर
आहनी सलाखों के
उस ही क़ैद ख़ाने में
एक और तोता है
जो कभी निराला था
गीत भी निराले थे
बूढ़ा सुन के कहता था
गीत ख़ूब होते हैं
बस ख़याल ये रखना
गीत की कोई सरगम
गीत की कोई परवाज़
आहनी सलाख़ों से
हो न जाए बालातर
अब वो चुप ही रहता है
गीत गा नहीं पाता
चोंच ही हिलाता है
चोंच ही हिलाता है
और फिर भी वो बूढ़ा
तालियाँ बजाता है
हाट के दो राहे पर
हाट के दो राहे पर















