अचानक हिज्र में फ़रियाद कर के

ठहर जाता हूँ तुझ को याद कर के

वो मुझ को क़ैद करता जा रहा है
मेरी हर आरज़ू आज़ाद कर के

सुख़न-साज़ी को इक दिन छोड़ देंगे
लब-ओ-लहजा नया ईजाद कर के

कोई हाथों में इक तेशा थमा दे
मुझे ज़रख़ेज़ से फ़रहाद कर के

— ZARKHEZ

More by ZARKHEZ

Other ghazal from the same pen

See all from ZARKHEZ →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling