तीरगी में जब उतर जाता हूँ मैं
रौशनी बन कर बिखर जाता हूँ मैं
साफ़ हो जाते हैं आवाज़ों के अक्स
ख़ामोशी से जब भी भर जाता हूँ मैं
जो नहीं कहना है कह देता हूँ वो
जो नहीं करना है कर जाता हूँ मैं
धूप सह कर भी नहीं जलता बदन
छाँव में जाते ही मर जाता हूँ मैं
जिस किसी को शा'इरी से है शग़फ़
उस के सीने में उतर जाता हूँ मैं
ऐसा सन्नाटा है मेरे चार-सू
अपनी आहट से भी डर जाता हूँ मैं
— ZARKHEZ















