रौशनी चुरा ली है
जेब में छुपा ली है
आज सुब्ह उठते ही
नींद की दवा ली है
ऐ ज़मीन ऊपर उठ
आसमान ख़ाली है
मैं ने उन निगाहों से
फिर शिकस्त खा ली है
उस ने मेरी ख़ुशबू आज
जिस्म पर लगा ली है
ख़ामुशी के हल्के में
शोर ने जगा ली है
मज्लिसी तबस्सुम ने
आबरू बचा ली है
इस दफ़ा दिवाली पर
आरज़ू जला ली है
ज़िंदगी चराग़ों की
रात ने बिता ली है
तू ने मेरी ख़ामोशी
दिल से क्यूँ लगा ली है
— ZARKHEZ















