दिल के क़रार-ओ-ज़ब्त की दुनिया बिखर गई
आँखों के सामने से हक़ीक़त गुज़र गई
सोचा था जिस के क़ुर्ब से भर जाएगा ख़ला
वो अपना ख़ालीपन भी मिरे नाम कर गई
वो ज़िंदगी जो हम ने बनाई थी ख़्वाब को
क्या ज़िंदगी वो ख़्वाब के अंदर गुज़र गई
इक कर्ब था जो आह से रौशन नहीं हुआ
इक बात थी जो ख़ौफ़ के साए में मर गई
कल रात बुझ गया मिरी उम्मीद का चराग़
कल रात इंतिज़ार की धड़कन ठहर गई
मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा ही था कि बस
इक शय सियाह रात सी मुझ में उतर गई
— ZARKHEZ















