"शर्तें"
वो एक लम्हा
जो उस की मेरी
अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था
हमारी दोनों की ज़िन्दगी था
अजीब शर्तों पे जल रहा है
वो लम्हा करवट बदल रहा है
वो कह रही है
कि मुझ से मिलने की आरज़ू तुम
जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो
कि साँस लेने में मुश्किलें हों
तो मुझ को आ कर गले लगाना
और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना
लिहाज़ा इक दिन
मैं जैसे तैसे
तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला
छुड़ाने निकला
तो भेद जाना
किसे ख़बर थी
कि मेरी साँसें
जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी
तो उस की शर्तें नकार देंगी
वो एक लम्हा
जो उस की मेरी
अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था
हमारी दोनों की ज़िन्दगी था
हलाक शर्तों को कर गया है
किसी अँधेरे में मर गया है















