"सवाल"
उदासियों के सफ़र में
जानाँ तुम्हारी यादों के सारे ज़र्रे
मैं अंदरूँ से उठा-उठा कर
गुज़िश्ता लम्हों की रह-गुज़र पर
बिखेरता हूँ
समेटता हूँ
तुम ही बताओ
ये सारे ज़र्रे
मेरे ही दश्त-ए-वुजूद के हैं
या फिर तुम्हारी नमूद के हैं
— ZARKHEZ
उदासियों के सफ़र में
जानाँ तुम्हारी यादों के सारे ज़र्रे
मैं अंदरूँ से उठा-उठा कर
गुज़िश्ता लम्हों की रह-गुज़र पर
बिखेरता हूँ
समेटता हूँ
तुम ही बताओ
ये सारे ज़र्रे
मेरे ही दश्त-ए-वुजूद के हैं
या फिर तुम्हारी नमूद के हैं
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