आइना उस ने तोड़ फेंका है
मेरी आँखों में काँच बिखरा है
मैं तेरे लब तो चूम लेता हूँ
फिर मेरे लब से ख़ून बहता है
बंद कर के तमाम दरवाज़े
तेरी ख़ुशबू को रोक रक्खा है
मैं यहाँ बस्तियों में तन्हा हूँ
दश्त भी दश्त में अकेला है
जिस जगह तुम ने हाथ छोड़ा था
दिल उसी बाग़ में टहलता है
मेरी हद थी फ़क़त दरीचों तक
मेरा बचपन ख़राब गुज़रा है
फिर तो जलना भी लाज़िमी होगा
गर तुझे तीरगी निगलना है
— ZARKHEZ















