Meaning of

दश्त

dasht • دشت

मरुस्थल; जंगल

desert; wilderness

صحرا; جنگل

Persian

मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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मुझ को किस दश्त से लाई थी कहाँ छोड़ गई
इन हवाओं से कोई पूछने वाला भी नहीं

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एक आवाज़ पे आ जाती है दौड़ी दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान नहीं देखती है

दोस्ती दोस्ती होती है तुम्हें इल्म नहीं
दोस्ती फ़ाइदा नुक़सान नहीं देखती है

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दीवारों पर दस्तक देते रहिएगा
दीवारों में दरवाज़े बन जाएँगे

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दश्त छोड़े हुए अब तो अर्सा हुआ
मैं हूँ मजनूँ मगर नाम बदला हुआ

मुझ को औरत के दुख भी पता हैं कि मैं
एक लड़का हूँ बेवा का पाला हुआ

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वही मंज़िलें वही दश्त ओ दर तिरे दिल-ज़दों के हैं राहबर
वही आरज़ू वही जुस्तुजू वही राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ

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अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले

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दश्त जैसी उजाड़ हैं आँखें
इन दरीचों से ख़्वाब क्या झांकें

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शग़्ल था दश्त-नवर्दी का कभी ऐ 'ताबाँ'
अब गुलिस्ताँ में भी जाते हुए डर लगता है

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ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है

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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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मुझ को किस दश्त से लाई थी कहाँ छोड़ गई
इन हवाओं से कोई पूछने वाला भी नहीं

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यह शब्द एक बंजर परिदृश्य की विशालता और एकांत को दर्शाता है। कविता में, यह अक्सर अलगाव, आत्मनिरीक्षण, और प्रकृति की कठोर सुंदरता का प्रतीक है।

कवि इसे एकांत, अस्तित्व, और आंतरिक यात्रा की खोज के लिए उपयोग करते हैं। यह हरे-भरे, उपजाऊ चित्रण के विपरीत लचीलापन और सहनशक्ति को उजागर कर सकता है।

अपनी मौन विस्तार में, 'दश्त' भीतर की विशालता पर चिंतन के लिए आमंत्रित करता है।