'होप'
कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं
जब भी तुझ से मिल कर लौटा
कितने तीर चले हैं मुझ पर
कितने सपने चाक हुए हैं
कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा
कैसे तुझ से ज़ख़्म छुपाएँ
लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम
इक वहशत थी तारी मुझ पर
एक चुभन सी साथ थी हर दम
लेकिन फिर भी तुझ से मिलने
हँसते हँसते आ जाता हूँ
— ZARKHEZ















