यूँँ हो गया हूँ इश्क़ से सर-शार आज कल
रहता हूँ ग़फ़्लतों में भी बेदार आज कल
क्या याद आ रही है मुझे उस गुलाब की
चुभ भी रहे हैं आँख में कुछ ख़ार आज कल
आसान लग रही है मुझे ज़िंदगी बहुत
आवारगी को ये भी है दुश्वार आज कल
मिलते नहीं हैं चाक गिरेबान इन दिनों
फ़ुरसत में मुब्तला हैं रफ़ूकार आज कल
कुछ है ख़बर भी अपने शब-ओ-रोज़ की तुझे
अच्छे गुज़र रहे हैं कि बेकार आज कल
— ZARKHEZ















