तू भी गर बे-वफ़ाई कर जाए
तो मेरा क़र्ज़ ही उतर जाए
ख़ुद-कुशी की सहूलतें तब हैं
जब कोई हादसा गुज़र जाए
ज़िन्दगी एक शाहज़ादी है
शाहज़ादी का दिल न भर जाए
मैं अगर ज़ब्त करने पर आऊँ
तिश्नगी तिश्नगी से मर जाए
वस्ल उस कैफ़ियत में लाज़िम है
जब हवस का नशा उतर जाए
या उभर आए आज वो सूरत
या मेरे हाथ से हुनर जाए
फिर किसी हुस्न की इनायत हो
फिर कोई सानेहा गुज़र जाए
हसरतों से छलक रहा है दिल
कोई ये जाम ख़ाली कर जाए
— ZARKHEZ















