"ख़्वाबों का सौदागर"
सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं
जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है
जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है
हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं
हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं
शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है
वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है
मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है
गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है
मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ
कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं















