"बुत-तराश"
तुम्हारे दिल ने हमेशा मुझ से शिकायतें की
कि मेरे सीने में दिल नहीं है
जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं
मैं चाहता हूँ
कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर
मेरे बदन में शरीक कर के
बड़े बड़े से सुराख कर दो
और उन में देखो
मुझे यक़ीं है
तुम्हें वहाँ इक
हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा
रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी
मिलेगा जो ख़ुद
शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर
तुम्हारी सूरत निखारता है
तुम्हारे बुत को तराशता है
— ZARKHEZ















