उन सेे जिस दिन सामना हो जाएगा
ज़ख़्म से फिर राब्ता हो जाएगा
इन अँधेरों में तुम्हारी याद से
रौशनी का हक़ अदा हो जाएगा
मैं ने अपनी आँख भी खोली अगर
राहबर मुझ से ख़फ़ा हो जाएगा
गुल खिले हैं और हवाएँ तेज़ हैं
आज फिर वो हादसा हो जाएगा
जज़्बा-ए-सुक़रात पैदा कीजिए
ज़हर भी आब-ए-बक़ा हो जाएगा
— ZARKHEZ















