"तलाश"

मैं ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
तलाश में अब
यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
तलाश का अब

सवेर होने पे रात का हश्र याद कर के
जहाँ था छूटा शुरू वहीं से करूँ लगूँ फिर
तलाश में अब

मैं झूठ ही दिल को दूँ दिलासा
के पूछ सपनों से और अपनों से मशवरा कर
तुझे तलाशूँ

मैं धूप से पूछता जो तुझ को गुज़रते देखा
हो दूर से अक्स को तिरे गर निखरते देखा
न खो दूँ फिर से ये सोच कर दौड़ मैं पड़ूँ पर
पहुँच तिरे अक्स तक तुझे फिर से खो ही देता

क़दम क़दम पर निशान खोजूँ
फिरूँ हूँ मारा डगर डगर मैं
कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर
निकल पड़ा हूँ
तलाश में अब

कभी जो रातों को गर मैं निकलूँ
तो जुगनुओं से पता लगाऊँ
करूँ मैं पीछा
हर इक सितारे का और फिर घर तलाश कर लूँ

गुज़र पड़े दर्द हद से तो फिर
ग़ज़ल कहूँ और दर्ज कर दूँ
दबा के पलकों
में अश्क अपने
निकल पड़ूँ फिर तलाश में पर
यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
तलाश का अब
के ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
तलाश में अब

— Karal 'Maahi'

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