Karal 'Maahi'

Karal 'Maahi'

@karalmaahi

Maahi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Maahi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अदीबों से शिकायत है न शिकवा मिरे अल्फ़ाज़ मारे जा चुके हैं — Karal 'Maahi'
बे-हयाई न हुई इत्र हुई बे-ढंगी बा-हया तो कभी इस रंग में बे-बाक न हो — Karal 'Maahi'
हक़ीक़ी और मजाज़ी में भला मैं क्या करूँँ तनक़ीद कहूँ मेरे लिए मेरा लिबास-ए-इश्क़ है 'माही' — Karal 'Maahi'
ईद पर दीद तेरी मिली चाँद को तब कहीं चाँद की ईद पूरी हुई — Karal 'Maahi'
होश तू आने न देना फिर मुझे देख साक़ी और दिखा मयख़्वारगी — Karal 'Maahi'
होड़ में एक दूजे से हम तुम जीत कर राब्ता हार जाएँ — Karal 'Maahi'
मुद्दत हुई कहा न कोई शे'र ख़ास-ओ-आम गो यूँँ किया कि आज ग़म-ए-इश्क़ कह लिया — Karal 'Maahi'
मुझे तलाश-ए-सुकूँ नहीं अब मिरे लिए तो ग़ज़ल बहुत है — Karal 'Maahi'
हैरत-ए-जल्वा बस इतने में समझ लो शाइरों की शा'इरी से ख़ूब-सूरत — Karal 'Maahi'
मैं किसी का न हुआ जिन के सिवा वो सभी के हैं मगर मेरे सिवा — Karal 'Maahi'
जो बीता बा'द तेरे एक क़िस्सा है अधूरापन मेरी तन्हाइयों का एक हिस्सा है अधूरापन — Karal 'Maahi'
हुस्न नसीहत इश्क़ इबादत मेरे लिए सौदाई है तुम माहिर हो सब में जानाँ ग़ज़ब क़लंदरकारी है — Karal 'Maahi'
दिवानों की ये बस्ती है दिवाने ही मिलेंगे बस बढ़ेगा दर्द जब हद से कहेंगे और खुल के हँस — Karal 'Maahi'

Ghazal

सौदा वफ़ा जफ़ा का बिठाना सही सही उल्फ़त नई नई है निभाना सही सही घाइल करे न दिल जो वो तीर-ए-अदा नहीं मर जाऊँ गर लगाओ निशाना सही सही आ जाओ बे-हिजाब तो भर लूँ नज़र नज़र मुड़कर न फिर कहूँगा दिखाना सही सही इक मशवरा दिया गया महबूब को मिरे आँसू बिछड़ते वक़्त गिराना सही सही तू झूठ पकड़े जाने की परवाह छोड़ दे मैं मान जाऊँगा तू सुनाना सही सही हर आस तोड़ दूँ मैं हर-इक ख़्वाब छोड़ दूँ तू सिर्फ़ मेरे दिल को दुखाना सही सही मुझ को ज़रा न छोड़ना तू ख़ुश्क हाल आज साक़ी शराब में तू डुबाना सही सही ज़र कर ले इख़्तियार तमाशा किए बिना हर बात पर कहेगा ज़माना सही सही लेना सुरों से क्या मिरा ज़िंदा हूँ लफ़्ज़ पर जज़्बात बे-सुरे ही सुनाना सही सही — Karal 'Maahi'
परेशाँ हूँ परेशानी मिटाने को पिला साक़ी ज़रा चैन-ओ-सकूँ भी जाम में मेरे मिला साक़ी भटक कर थक गया हूँ शहर में कुछ तो पिला साक़ी तू चाहे जो लगा क़ीमत मगर बोतल दिला साक़ी किसी से भी किसी की भी शिकायत अब नहीं करनी भुला दूँ सब गिले शिकवे मुझे ऐसी पिला साक़ी ज़रा सी और मय दे दे ज़रा सी प्यास की ख़ातिर ज़रा सा लड़खड़ाने पर तू यूँँ मत तिलमिला साक़ी मिरे ग़म के क़सीदों पर ज़माना हॅंस रहा है तो ठहाके मार कर तू भी ज़रा सा खिलखिला साक़ी तलाशा बे-तहाशा हो जिसे दिल से तराशा हो जिसे पी कर तमाशा हो मुझे ऐसी पिला साक़ी दिवानापन हो राँझे का घुली वहशत हो मजनूॅं की लपेटे जो कफ़न में उस रवानी की पिला साक़ी सभी बोतल पे बोतल पी रहे हैं मय-कदे में आज मज़ा इक घूँट में मुझ को समुंदर का दिला साक़ी हुनर हो ज़िंदगानी का मिले हर घूँट में जिस की मुझे पानी भी तू ऐसी रवानी का पिला साक़ी — Karal 'Maahi'
फिरता हूँ थाम कर मैं दिल-ओ-जाँ जहाँ तहाँ मिल जाए कोई ख़ाक फ़रोशाँ जहाँ तहाँ ये रात क्यूँँ सजाई उन्हें क्या बताउँगा बिखरे पड़े सितारों से अरमाँ जहाँ तहाँ कर मस नसीब जोबनों का उस के ऐ ख़ुदा फ़ुर्क़त मुझे करे है परेशाँ जहाँ तहाँ गुस्ताखियाँ शदीद हवस-गर रही मिरी करता है उज़्व-ए-ख़ास पशेमाँ जहाँ तहाँ परदेस आ गया था वतन छोड़ कर कभी हर रात गुज़री शहर-ए-ग़रीबाँ जहाँ तहाँ पहचान ही सी बन गई आवारगी मिरी बे-पर उड़ा मैं बन के जो मेहमाँ जहाँ तहाँ तुम वसवसे न पूछना बस देखते चलो तैनात उस के कितने निगहबाँ जहाँ तहाँ बस एक मैं रक़ीब था 'माही' का उस के घर उस ने किया है मेरा ही सामाँ जहाँ तहाँ — Karal 'Maahi'
ज़ाहिर न हो कभी कि सभी का रक़ीब हूँ फ़हमी ये ठीक है कि अधूरा रक़ीब हूँ जो शोर-ओ-ग़ुल मचाए मिरी सामेईन ने मेरे रक़ीब कह रहे उम्दा रक़ीब हूँ बाँका कहा निभा के रक़ाबत रक़ीब ने महबूब जानता है छबीला रक़ीब हूँ चर्चा वो कर रहे हैं कि चर्चा तो कीजिए महफ़िल में आ गया इक अबूझा रक़ीब हूँ मयख़ाना ख़ाली कर के भी मैं बा-अदब चला साक़ी समझ रहा था कि बिगड़ा रक़ीब हूँ दरिया इक आग का है सर-ए-इश्क़ ये मिरा गो आज़मा मुझे मैं पुराना रक़ीब हूँ फ़ितरत वतन-परस्त है ख़ौफ़-ए-सलीब क्या रहमत न करना मुझ पे तू पाशा रक़ीब हूँ मेरे हबीब हाल-ए-तबीअत का सोग छोड़ बज़्म-ए-रक़ीब का मैं चहीता रक़ीब हूँ क्या कैफ़ियत बताऊँ है कैसा जुनून-ए-इश्क़ दिल है खुली क़िताब कुशादा रक़ीब हूँ — Karal 'Maahi'
ये ग़ज़ल नज़्म ये नग़मात किसे पेश करूँँ मैं मुहब्बत के अमानात किसे पेश करूँँ मैं हुआ तेरी ज़मीं पर ही ग़ज़लगो साहिर अपने अशआर-ए-इबादात किसे पेश करूँँ मेरे जीने को बहुत है तिरे नग़्में साहिर आलम-ए-जज़्ब-ए-किफ़ायात किसे पेश करूँँ बात इतनी है कि महबूब मिरा है साहिर बात इतनी भी मैं बे-बात किसे पेश करूँँ इश्क़ मुझ को न मजाज़ी न हक़ीक़ी मालूम इश्क़ साहिर है ये ख़ुतबात किसे पेश करूँँ दाद क्या दूँ तिरी ग़ज़लों की तुझे मैं साहिर बस कि वहशत की ये बहुतात किसे पेश करूँँ क्यूँँ कहा तू ने कि शाइ'र है तू पल दो पल का इंतिहाई मिरे जज़्बात किसे पेश करूँँ ख़ाक से बुत हुआ फिर बुत से हुआ मैं इंसाँ कैसे नाज़िल हुए नग़मात किसे पेश करूँँ — Karal 'Maahi'

Nazm

"दिल-ए-मुब्तला" हाँ पता है तुम्हें मुहब्बत है बस नहीं जानती मुझी से क्यूँँ राम जाने कि क्या ही देख लिया एक मामूली शक्ल-ओ-सूरत हूँ गुफ़्तगू ख़्वार भी नहीं करती आँख मैं चार भी नहीं करती देख उन नाज़नीं हसीनों को सिर से पा तक नबीन हूरों को जल्वा-ए-बा कमाल है 'माही' नक़्श पूरा बवाल है 'माही' आह भर भर के देखते हैं सब आज़माओ भी अपनी क़िस्मत अब क्या पता दिल वो तुम पे ला बैठे नर्म लहजे में रहना बिन ऐंठे मैं दुआ मैं रखूँगी याद तुम्हें दे न पाएगा कोई माद तुम्हें कहने को अब नहीं है कुछ बाक़ी जाओ भी अब करो उन्हें राज़ी और इक मश्वरा ज़रूरी है बात जिस के बिना अधूरी है रात होने को दिन बुझाने में आँख तक नींद आने जाने में तुम मुझे याद तो नहीं करते वक़्त बर्बाद तो नहीं करते — Karal 'Maahi'
"तेरे जाने से, आने तक" तेरे जाने से, तेरे आने तक इक इंतिज़ार रहता है दिल बे-क़रार रहता है तुझ सेे मिलने का इक जुनून सिर पर सवार रहता है अक्सर तेरी यादों से रुख पर कुछ निखार रहता है बस एक दीद को तकती इन आँखों की पलकों में मेरी कुछ उभार रहता है पूछे जो कोई तो चुप रहता हूँ के क्यूँँकर तेरा इतना ख़ुमार रहता है गर्मी के मौसम में भी मुझ को क्यूँँ तेरा ही एक सो चार बुख़ार रहता है कोशिश तो करता हूँ ख़ुश रक्खूँ इस को फिर भी कमबख़्त दिल ये बीमार रहता है रुस्वा ही कर दूँ खो ही दूँ तुझ को ऐसी बातों से दिल ये होशियार रहता है तुझ सेे शुरू हुआ और तुझ पे ही ख़त्म मेरा दिल तुझ पर जाँनिसार रहता है तेरे बिन आई जो साँसें मुझ को उन का भी जान मुझ पे उधार रहता है धड़कन से धड़कन के बीच की घड़ियों में तेरी ही यादों का शुमार रहता है तेरे हर इक इशारे पर हद ये पार करने को मेरा दिल हर पल तैयार ही रहता है तेरी ही जुस्तजू है तेरी ही चर्चा मेरा तो बस ये रोज़गार रहता है पूछे ख़ुदा अगर तो फिर भी यही कहूँ तेरा हूँ तेरा बस ये ख़याल रहता है तेरे जाने से, तेरे आने तक... — Karal 'Maahi'
मरहले इज़हार-ए-इश्क़ को जो चला तो हुआ ये हाल आया मैं लौट साथ लिए यार इक मलाल मेरे रक़ीब ने कहा कहता हूँ एक बात तेरा हबीब साथ मिरे ही था पिछली रात सुन कर चुभी बहुत मुझे उस ने कही जो बात अँगड़ाइयाँ तवील थीं दोनों की चाँद-रात क्यूँँ मेरी धड़कनों का सबब कर दिया जुदा क्या तख़्त आ गया तिरा ख़तरे में ऐ ख़ुदा कर दर-किनार मेरी दुआ को है खेलता मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से क्यूँँ हिज्र का जुआ रब्ब-ए-करीम अब तो करामात कुछ दिखा बन कर हबीब हाथ ज़रा थाम तू मिरा मायूस तुझ से है तू ही इस को सँभाल के दिल इक शफ़ीक़ जाँ है शिकस्ता किया जिसे मेरे लिए बहुत है जनाज़े का इंतिज़ार हो आरज़ू-ए-शोख़ मुबारक सितम-शिआर पर ये न तू समझना कि बर्बाद हाल में छुप कर शब-ए-सियाह गुज़ारूँ मलाल में ठहरूँ न अब कभी दिल-ए-गुलफ़ाम थाम कर दिन काम कर गुज़ार दूँ शब वक़्फ़-ए-जाम कर — Karal 'Maahi'
"तलाश" मैं ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने तलाश में अब यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ तलाश का अब सवेर होने पे रात का हश्र याद कर के जहाँ था छूटा शुरू वहीं से करूँँ लगूँ फिर तलाश में अब मैं झूठ ही दिल को दूँ दिलासा के पूछ सपनों से और अपनों से मशवरा कर तुझे तलाशूँ मैं धूप से पूछता जो तुझ को गुज़रते देखा हो दूर से अक्स को तिरे गर निखरते देखा न खो दूँ फिर से ये सोच कर दौड़ मैं पड़ूँ पर पहुँच तिरे अक्स तक तुझे फिर से खो ही देता क़दम क़दम पर निशान खोजूँ फिरूँ हूँ मारा डगर डगर मैं कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर निकल पड़ा हूँ तलाश में अब कभी जो रातों को गर मैं निकलूँ तो जुगनुओं से पता लगाऊँ करूँँ मैं पीछा हर इक सितारे का और फिर घर तलाश कर लूँ गुज़र पड़े दर्द हद से तो फिर ग़ज़ल कहूँ और दर्ज कर दूँ दबा के पलकों में अश्क अपने निकल पड़ूँ फिर तलाश में पर यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ तलाश का अब के ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने तलाश में अब — Karal 'Maahi'