जो मोजिज़े ही जहाँ में हुनर के देखते हैं
फ़राज़ को वो ग़ज़ल-गो गुज़र के देखते हैं
सुनो फ़राज़ उसे याद अब नहीं हैं हम
मुरीद हैं हमीं एहसास कर के देखते हैं
ख़बर मिली कि वो आई है शहर में कल शब
जनाब ख़्वाब उसी बे-ख़बर के देखते हैं
ये क़हर है कि तिलिस्मी हुए हैं शे'र सभी
नज़र के तीर जो हम यक-दिगर के देखते हैं
हुनर तराश ले 'माही' बिना किए तौबा
सुख़न-वरों के यहाँ ताक-कर के देखते हैं
— Karal 'Maahi'














