नक़्श मेरी लाश पर ऐसे लगे हैं
दफ़्न थे जो राज़ वो खुलने लगे हैं
बेवफ़ाई से हुआ है फ़ाइदा एक
आँसुओं से ज़ख़्म कुछ धुलने लगे हैं
यार मेरे हश्र की तू इंतिहा देख
फूल से भी पाँव अब छिलने लगे हैं
सिर्फ़ दो मिसरे कहे मैं ने ग़ज़ल के
दिल सभी के क्यूँ यहाँ दुखने लगे हैं
लग रहा है तुम भी सच कहने लगे हो
अब तुम्हारे बोल भी चुभने लगे हैं
टूट कर मुझ को बिखरता देखने को
शहर भर के लोग अब रुकने लगे हैं
तुम ही माही रह गए बे-शर्म बद-ज़ौक़
अब शजर भी शर्म से झुकने लगे हैं
— Karal 'Maahi'















