"ख़त"
हालात पर इक दोष था
मजबूर कर के रख दिया
हालात ने अपनी दिफ़ा में एक ख़त फिर लिख दिया
आदम सुनो
किस के कहन पर चल रहे
जो ख़ुद ही ख़ुद को खल रहे
मंज़िल चुनी रस्ता चुना
ख़ुद आप ही बस्ता बुना
फिर क्यूँ उफ़न मुझ पर रहे
किस के कहन पर चल रहे
क्यूँ चाल लालच में भला टेढ़ी चली मेढ़ी चली
जिस के सबब से दाल बिल्कुल भी तुम्हारी नइ गली
अब दाल गलने से रही
तो क्यूँ जलाते जा रहे
क्यूँ तुम जली ये दाल अब सब को खिलाते जा रहे
यूँ क्यूँ सभी को छल रहे
किस के कहन पर चल रहे
— Karal 'Maahi'















