फिरता हूँ थाम कर मैं दिल-ओ-जाँ जहाँ तहाँ
मिल जाए कोई ख़ाक फ़रोशाँ जहाँ तहाँ
ये रात क्यूँ सजाई उन्हें क्या बताउँगा
बिखरे पड़े सितारों से अरमाँ जहाँ तहाँ
कर मस नसीब जोबनों का उस के ऐ ख़ुदा
फ़ुर्क़त मुझे करे है परेशाँ जहाँ तहाँ
गुस्ताखियाँ शदीद हवस-गर रही मिरी
करता है उज़्व-ए-ख़ास पशेमाँ जहाँ तहाँ
परदेस आ गया था वतन छोड़ कर कभी
हर रात गुज़री शहर-ए-ग़रीबाँ जहाँ तहाँ
पहचान ही सी बन गई आवारगी मिरी
बे-पर उड़ा मैं बन के जो मेहमाँ जहाँ तहाँ
तुम वसवसे न पूछना बस देखते चलो
तैनात उस के कितने निगहबाँ जहाँ तहाँ
बस एक मैं रक़ीब था 'माही' का उस के घर
उस ने किया है मेरा ही सामाँ जहाँ तहाँ
— Karal 'Maahi'















