"दिल-ए-मुब्तला"
हाँ पता है तुम्हें मुहब्बत है
बस नहीं जानती मुझी से क्यूँ
राम जाने कि क्या ही देख लिया
एक मामूली शक्ल-ओ-सूरत हूँ
गुफ़्तगू ख़्वार भी नहीं करती
आँख मैं चार भी नहीं करती
देख उन नाज़नीं हसीनों को
सिर से पा तक नबीन हूरों को
जल्वा-ए-बा कमाल है 'माही'
नक़्श पूरा बवाल है 'माही'
आह भर भर के देखते हैं सब
आज़माओ भी अपनी क़िस्मत अब
क्या पता दिल वो तुम पे ला बैठे
नर्म लहजे में रहना बिन ऐंठे
मैं दुआ मैं रखूँगी याद तुम्हें
दे न पाएगा कोई माद तुम्हें
कहने को अब नहीं है कुछ बाक़ी
जाओ भी अब करो उन्हें राज़ी
और इक मश्वरा ज़रूरी है
बात जिस के बिना अधूरी है
रात होने को दिन बुझाने में
आँख तक नींद आने जाने में
तुम मुझे याद तो नहीं करते
वक़्त बर्बाद तो नहीं करते















