आप कहते हो मैं नबी तो नहीं
क़त्ल कर दूँ वो आदमी तो नहीं
कौन मुझ को दे क़ीमती तोहफ़े
मैं किसी का हिमायती तो नहीं
ये हुनर देन असातिज़ा का है
शे'र कहना बराबरी तो नहीं
बा-वफ़ा हूँ मगर यही सच है
कि मैं तक़दीर आप की तो नहीं
हाल-ए-ख़स्ता टटोल कर बोले
आस्तीं देखना नमी तो नहीं
लाई पैग़ाम इक सखी उस की
साहिब-ए-दिल को हड़बड़ी तो नहीं
सच छुपा ले मगर तू झूठ न बोल
तेरी ता'बीर ख़्वाब की तो नहीं
बोल देता हूँ मुँह में जो आए
मैं ने ग़ज़लें कभी कही तो नहीं
वो किसी पीर की दुआ सी है
क्यूँ कि माही इबादती तो नहीं
— Karal 'Maahi'















