इतना पसंद आया तिरे इनकार का अंदाज़
शायद न भाए अब मुझे इक़रार का अंदाज़
उस पर बनी है जान पर इस कैफ़ियत तहत
लेगा मिरी ही जाँ तिरे इक़रार का अंदाज़
मालूम है इतराएगी वो सामने सबके
सुन कर जुदा है आप के बीमार का अंदाज़
क्यूँ जाँ पे बन आई अगर पर्दा-नशीं थी वो
नज़र-ए-क़यामत क्या कहूँ दीदार का अंदाज़
मक़बूलियत ही है रहेगा रहती दुनिया तक
क़ाएम बनाए तेरे इस फ़नकार का अंदाज़
शाकिर नहीं माना मगर ख़ूबी है उस के पास
रहने दे माही तू तिरा बेकार का अंदाज़
— Karal 'Maahi'















