हमारी सम्त गर हम दम न होंगे
तो क्या हम ग़ैर-मुस्तहकम न होंगे
तुम आ कर बैठ जाओ मय-कदे में
नशे में होने के मातम न होंगे
गिराना अब न इन पलकों को जानाँ
हमारे शे'र फिर रुस्तम न होंगे
ग़ज़ल कहनी अगर सब छोड़ दें तो
मुहब्बत के नए परचम न होंगे
सहारा है हमारा ऐ ग़ज़ल तू
हमारे ज़ख़्म पर मरहम न होंगे
हफ़ीज़ अब कह दिया हम ने जो कहना
ज़मीं तेरी पर अब जोखम न होंगे
— Karal 'Maahi'















