ख़त पर अपना नाम न लिखना रखना तुम बे-नाम
जान न जाएँ सखियाँ मेरी किस का है पैग़ाम
पी को पाने की धुन रहती मुझ को सुब्ह-ओ-शाम
शर्तें बता कितनी हैं जिन
में पी हो मेरे नाम
आँख हुई नम-दीदा मेरी भाव हुए अनमोल
पी माँगे तो दे दूँ उन को सब कुछ मैं बे-दाम
हाकिम हैं वो उन से मिलना है कितना पुर-पेच
उन की दीद की ख़ातिर ले लूँ ख़ुद पर हर इल्ज़ाम
वो स्वामी हैं सबके गरचे मेरे न ऐसे भाग
मुझ बिरही को स्मृति भी उन की है माही ईनाम
अपना बना ले 'माही' मुझ को अब तक हूँ शफ़्फ़ाफ़
फिर तेरी मर्ज़ी कर मैला या कर दे नीलाम
— Karal 'Maahi'















