मरहले

इज़हार-ए-इश्क़ को जो चला तो हुआ ये हाल
आया मैं लौट साथ लिए यार इक मलाल

मेरे रक़ीब ने कहा कहता हूँ एक बात
तेरा हबीब साथ मिरे ही था पिछली रात

सुन कर चुभी बहुत मुझे उस ने कही जो बात
अँगड़ाइयाँ तवील थीं दोनों की चाँद-रात

क्यूँ मेरी धड़कनों का सबब कर दिया जुदा
क्या तख़्त आ गया तिरा ख़तरे में ऐ ख़ुदा

कर दर-किनार मेरी दुआ को है खेलता
मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से क्यूँ हिज्र का जुआ

रब्ब-ए-करीम अब तो करामात कुछ दिखा
बन कर हबीब हाथ ज़रा थाम तू मिरा

मायूस तुझ से है तू ही इस को सँभाल के
दिल इक शफ़ीक़ जाँ है शिकस्ता किया जिसे

मेरे लिए बहुत है जनाज़े का इंतिज़ार
हो आरज़ू-ए-शोख़ मुबारक सितम-शिआर

पर ये न तू समझना कि बर्बाद हाल में
छुप कर शब-ए-सियाह गुज़ारूँ मलाल में

ठहरूँ न अब कभी दिल-ए-गुलफ़ाम थाम कर
दिन काम कर गुज़ार दूँ शब वक़्फ़-ए-जाम कर

— Karal 'Maahi'

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