ख़ुद आप बैठें बिठाए रक्खें

कि रंग-ए-महफ़िल जमाए रक्खें

बताओ वो क्या छुपाए रक्खें
जो आस्तीनें चढ़ाए रक्खें

वो लोग लाओ किराए पर तुम
जो शोर-ओ-ग़ुल कुछ मचाए रक्खें

तराश दो-धार का हुनर लें
कि दुश्मन-ए-जाँ डराए रक्खें

नई फ़ज़ा रंग हैं मुनासिब
मगर पुराने बचाए रक्खें

मिटा के ला-इल्मी लो सब अपने
असातिज़ा की जलाए रक्खें

मिली है विर्से में इल्म-ए-मजलिस
इसे रखें और बनाए रक्खें

न बोल कर कुछ भी माँ के आगे
है लाज़िमी सिर झुकाए रक्खें

विसाल लिक्खें फ़िराक़ गाएँ
मुरीद माही बनाए रक्खें

— Karal 'Maahi'

More by Karal 'Maahi'

Other ghazal from the same pen

See all from Karal 'Maahi' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling