परेशाँ हूँ परेशानी मिटाने को पिला साक़ी
ज़रा चैन-ओ-सकूँ भी जाम में मेरे मिला साक़ी
भटक कर थक गया हूँ शहर में कुछ तो पिला साक़ी
तू चाहे जो लगा क़ीमत मगर बोतल दिला साक़ी
किसी से भी किसी की भी शिकायत अब नहीं करनी
भुला दूँ सब गिले शिकवे मुझे ऐसी पिला साक़ी
ज़रा सी और मय दे दे ज़रा सी प्यास की ख़ातिर
ज़रा सा लड़खड़ाने पर तू यूँ मत तिलमिला साक़ी
मिरे ग़म के क़सीदों पर ज़माना हॅंस रहा है तो
ठहाके मार कर तू भी ज़रा सा खिलखिला साक़ी
तलाशा बे-तहाशा हो जिसे दिल से तराशा हो
जिसे पी कर तमाशा हो मुझे ऐसी पिला साक़ी
दिवानापन हो राँझे का घुली वहशत हो मजनूॅं की
लपेटे जो कफ़न में उस रवानी की पिला साक़ी
सभी बोतल पे बोतल पी रहे हैं मय-कदे में आज
मज़ा इक घूँट में मुझ को समुंदर का दिला साक़ी
हुनर हो ज़िंदगानी का मिले हर घूँट में जिस की
मुझे पानी भी तू ऐसी रवानी का पिला साक़ी















