ज़रा देख अपने क़लमकार की धूम

सुलभ पैरहन में है किरदार की धूम

मिरे अलविदा कहने के बा'द उट्ठी
उसी बज़्म में मेरे अश'आर की धूम

खड़ा कर कटहरे में दिल पूछ बैठा
मचाई कभी तुम ने बेकार की धूम

इक अर्सा हुआ उस को परदेस में
कि दिल ने मनाई न दीदार की धूम

दिवाने कि परवाने जो भी कहो तुम
समझते नहीं हैं वो दरबार की धूम

दिवाली कि रमज़ान होली हो या ईद
रही ग़ैर-वाजिब जमादार की धूम

किया रक़्स मुर्शिद ने ग़ज़लों पे मेरी
दिखी आज मुझ को इक अनवार की धूम

नहीं है इबादत से वाबस्ता माही
कलाम उस का है इक ख़तावार की धूम

— Karal 'Maahi'

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