सौदा वफ़ा जफ़ा का बिठाना सही सही
उल्फ़त नई नई है निभाना सही सही
घाइल करे न दिल जो वो तीर-ए-अदा नहीं
मर जाऊँ गर लगाओ निशाना सही सही
आ जाओ बे-हिजाब तो भर लूँ नज़र नज़र
मुड़कर न फिर कहूँगा दिखाना सही सही
इक मशवरा दिया गया महबूब को मिरे
आँसू बिछड़ते वक़्त गिराना सही सही
तू झूठ पकड़े जाने की परवाह छोड़ दे
मैं मान जाऊँगा तू सुनाना सही सही
हर आस तोड़ दूँ मैं हर-इक ख़्वाब छोड़ दूँ
तू सिर्फ़ मेरे दिल को दुखाना सही सही
मुझ को ज़रा न छोड़ना तू ख़ुश्क हाल आज
साक़ी शराब में तू डुबाना सही सही
ज़र कर ले इख़्तियार तमाशा किए बिना
हर बात पर कहेगा ज़माना सही सही
लेना सुरों से क्या मिरा ज़िंदा हूँ लफ़्ज़ पर
जज़्बात बे-सुरे ही सुनाना सही सही















