अदीब दुनिया समझ रही है तो क्यूँँ न ख़ुद को वहीद कर लूँतराश कर हर हुनर को अपने मज़ीद मुर्शिद मुरीद कर लूँरदीफ़ बाँधूँ ग़ज़ल में ऐसा हर इक मआ'नी फ़रीद कर लूँजरीद लूँ क़ाफ़िए के अश'आर मैं सभी अब शदीद कर लूँ— Karal 'Maahi'