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ज़िन्दगी तुझ से मुलाक़ात पे रो देते हैं
फिर तेरे ही दिए हालात पे रो देते हैं
फिर तेरे ही दिए हालात पे रो देते हैं
ख़ुद सितम ढा के वो ये रोज़ कहा करते थे
आप तो छोटी सी हर बात पे रो देते हैं
ये ज़रूरी नहीं के बस ख़ुशी का मंज़र हो
है कई लोग, जो बरसात पे रो देते हैं
भूख पानी से मिटा कर, भी न पूरी हो तो
बाप फिर बच्चों की हाजात पे रो देते हैं
देर तन्हाई के बा'द ओस की बूँदे 'आदिल'
देख लगता है के दिन रात पे रो देते हैं
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हर वो तारीख़ साल दोहराता
मेरा दुश्मन तो ये कैलन्डर है
मेरा दुश्मन तो ये कैलन्डर है
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रंग बदले जा रही है चाय अब
पत्तियाँ घुलने लगी है इश्क़ की
पत्तियाँ घुलने लगी है इश्क़ की
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थाल में हम को मिले रिश्तों के शिकवे और गिले
ज़ाइक़े में इश्क़ का ही बस निवाला रह गया
ज़ाइक़े में इश्क़ का ही बस निवाला रह गया
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