Saahir

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    इश्क़ में नाकाम हो कर शा'इरी करती रही और
    ग़म उदासी की दुकाँ बनती गईं नस्लें हमारी
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    आसमाँ में है ख़ुदा, क्या सब दुआएंँ आसमाँ तक जा रही हैं
    मेरी इक फ़रयाद पूरी हो तो मैं मानूँ वहाँ तक जा रही हैं
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    सोचता हूँ कि क्या चीज़ ये ज़िंदगी है
    बढ़ रही है या फिर उम्र कम हो रही है

    जज़्ब, बहरें, मआ'नी, अदब, तज़रबे आदि
    इन सभी को मिला जो बने, शा'इरी है
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    जो भी मिलती है हमें वो है सही अपनी जगह पर
    मौत है अपनी जगह तो, ज़िंदगी अपनी जगह पर

    पहले मैं भी सोचा करता था कि दोनों मुख़्तलिफ़ हैं
    आशिक़ी अपनी जगह पर, ख़ुद-कुशी अपनी जगह पर

    शा'इरी को धंधा मत समझो समझने वालों, मुझ को
    नौकरी अपनी जगह है, शा'इरी अपनी जगह पर

    उस की आँखें काम दो दो साथ में करती हैं, उस का
    देखना अपनी जगह पर, दिल-लगी अपनी जगह पर

    फ़र्क़ होता है क़ज़ा और ख़ुद-कुशी में, आँसू के साथ
    ख़ुद-कुशी ने सब को बदनामी भी दी अपनी जगह पर

    तुम मोहब्बत में मेरे पीछे न उतरो तो ही बेहतर
    मैं करा लेता हूँ कुछ नुक़सान भी अपनी जगह पर

    ध्यान रखना तुम कहाँ, क्या ठीक है बच्चे, जहाँ में
    बोलना अपनी जगह पर, ख़ामुशी अपनी जगह पर

    उलझे हैं हम लोग इक चक्कर में कितने जन्मों से यूँ
    ज़िंदगी ये मौत से मिलती रही अपनी जगह पर

    मैं मोहब्बत से यूँ भी दूरी बना कर रखता हूँ क्योंकि
    छोड़ती है दर्द काफ़ी ये ख़ुशी अपनी जगह पर

    सोचता हूँ मैं कभी क्या ठीक है ये जो है 'साहिर'
    औरतें अपनी जगह पर, आदमी अपनी जगह पर
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    देखना तुझे मेरी बद-दुआ' लगेगी दोस्त
    तेरे ज़ख़्मों को भी खारी हवा लगेगी दोस्त

    चाहते हो मैं सब कुछ भूल जाऊँ पर इस
    में
    एक जिस्म के मिलने से दवा लगेगी दोस्त

    मसअला ये ही तो है इश्क़ का कि जिस को मैं
    देता बद-दुआ' उस को भी दुआ लगेगी दोस्त

    एक आख़िरी ख़त पढ़ कर के जा कि जिस
    में मैं
    लिखता था मेरी बेटी तेरी क्या लगेगी दोस्त

    वो नहीं लगी बिल्कुल भी मुझे मेरी अपनी
    देख कर जिसे मुझ को था लगा, लगेगी दोस्त

    जो मोहब्बतों को तदबीर कहते हैं 'साहिर'
    एक दिन मुहब्बत उन को वबा लगेगी दोस्त
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    यार जुगनू, मुहब्बत रहें तितलियां
    इश्क़ में एक ये क़ायदा, था कभी
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