शिकस्त-ए-दिल है ग़म ऐसा कहीं लज़्ज़त नहीं आतीमिले कितने भी ता'ने फिर मगर ज़िल्लत नहीं आतीगुमाँ है हुस्न पे उस को चढ़ा हमपे ख़ुमार-ए-इश्क़उसे उल्फ़त नहीं आती हमें ग़ैरत नहीं आती— Rehaan