Rehaan

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@an_unknown_diary

Rehaan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rehaan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

नहीं था इश्क़ में फिर भी मैं क्या क्या लिख चुका अब तक अगर दिल टूट जाता तो मैं क्या क्या लिख रहा होता — Rehaan
ताकि समझे तू भी हिज्र क्या चीज़ है जा रहा हूँ बहुत दूर मैं तुझ सेे अब — Rehaan
ये अलग बात है मैं इन दिनों बेचैन सा हूँ पर ये चाहत भी मेरी थी कि जुदा हो जाएँ — Rehaan
इक रोज़ मैं ने उस सेे ही वापस मिलाया था उसे और ले गई इक दिन मुझे फिर छीन कर वो मुझ सेे ही — Rehaan
थी दिल-लगी की ख़बर हमें भी था इल्म उन को भी आशिक़ी का ये हादसा है कि अपनी-अपनी जगह पे दोनों मुकर गए हैं — Rehaan
है क़ुबूल तुम को भरना सर-ए-आम बाहों में पर है ये शर्त फिर कभी तुम न मिलोगी आइने से — Rehaan
तोहफ़े तो सभी क़ुबूल हैं तुम्हारे पर सुनो तोहफ़ों के शजर पे जाँ कभी शग़फ़ नहीं खिला — Rehaan
क़ुबूल है मुझे इज़हार जो किया उस ने है शर्त बस कि न पूछे अतीत वो मेरा — Rehaan
कुछ इस लिए भी कि शर्मिन्दगी न हो तुम को मैं अंजुमन में मिला तुम सेे अजनबी की तरह — Rehaan
तुम में और चाँद में बस एक यही अंतर है वो हसीं ज़्यादा है और तुम पे कोई दाग़ नहीं — Rehaan
ये इल्म के साथ भी कि शायद यही मुलाक़ात आख़िरी हो मैं जा रहा हूँ उसे कोई अलविदा वगैरह कहे बिना ही — Rehaan
उसे अगर समझना हो तो उस को ये इशारा है कि उस की इक सहेली मुझ को जानती ब-ख़ूबी है — Rehaan
मिलना क़ुबूल तेरे होंठों से होंठ लेकिन होंठों के मिलने भर से मिलते नहीं हैं दो दिल — Rehaan
वादे तो सभी कर लूँ मैं क़ुबूल तेरे पर वादो की बिना पे जाँ उल्फ़तें नहीं टिकतीं — Rehaan
चॉकलेट तो क़ुबूल है तुम्हारा पर सुनो ये नुमाइशें न ला सकेंगी रिश्तों में मिठास — Rehaan
क़ुबूल है दिया उस ने गुलाब जो मुझ को है शर्त बस ये कि बाक़ी गुलाब फेंक दे वो — Rehaan

Ghazal

इश्क़ की पेचीदगी में हम उलझ कर रह गए हँसते हँसते हर सितम को ख़ामोशी से सह गए हम को सब मालूम था अहद-ए-वफ़ा को चुप रहे और जो अनजान थे वो हम को क्या क्या कह गए था गुमाँ हम को बहुत हैं चाहने वाले हमें वक़्त पर सब ताश के पत्तों के जैसे ढ़ह गए चार दिन की ज़िन्दगी में चार सौ आशिक़ मिले हम मगर उन के बिना फिर भी अकेले रह गए उन के कूचे से जो गुज़रे कल महीनों बा'द हम आँख से अफ़सोस के आँसू अचानक बह गए एक वो जिन की गली में हर पहर हलचल रही एक हम जो ख़ुद से मिलने को तरसते रह गए हम नशे में भी बिगड़ पाए नहीं उन पर कभी होश में भी वो मगर हम को बहुत कुछ कह गए बस तुम्हारी शा'इरी में दर्द ज़िन्दा रखने को क्या ख़बर 'रेहान' कितनी ज़िल्लतें हम सह गए — Rehaan
जिन महफ़िलों में तू हो कोई और क्या चर्चा करे जो सामने हो तू अगर कैसे कोई पर्दा करे तुझ में हुनर तुझ में हया तू है हसीं तू है ख़ुदा दिल पर बड़ी आफ़त कि ये किस बात पे झगड़ा करे हम दोपहर की धूप में गुमराह तेरे शहर में कह दे किसी शजरे से तू हम पर ज़रा साया करे छुप कर मिले बातें करे ता'ने सुने रुस्वा भी हो इक अजनबी के वास्ते लड़की भला क्या-क्या करे अख़बार के इस दौर में किस को सुनाएँ हाल-ए-दिल हर कोई बद-गो है यहाँ हर कोई हंगामा करे तू वो ग़ज़ल जिस के सभी अश'आर हम सेे बे-ख़बर और दिल हमारा नज़्म ये हर पल तुझे गाया करे तुझ को मुबारक हो यही तो चाहतें थीं कल तेरी दिल रात भर रोया करे दिल रात भर तड़पा करे ये है दुआ 'रेहान' की रब से तुझे बेटा मिले वो भी किसी की दीद को यूँँ रात-दिन तरसा करे — Rehaan
तुम्हारे बा'द दुनिया में बचा क्या है कि अब ये ऐश-ओ-इशरत ये मज़ा क्या है बिछड़ कर तुम सेे मुझ को ये समझ आया जहाँ में इश्क़ से बढ़ कर नशा क्या है कि एक और एक मिल कर एक बनता है मोहब्बत में गणित का क़ायदा क्या है सहे हैं मैं ने कितने ही सितम हँस कर कभी ये तक नहीं पूछा ख़ता क्या है बनाया है रक़ीबों को ख़ुदा मैं ने ये मुझ को मत सिखाओ तुम वफ़ा क्या है तुम्हें जो चाहते हैं सब मुनाफ़िक़ हैं तुम इक दिन जान जाओगी दग़ा क्या है गुनाह-ए-इश्क़ से सीखा है बस इतना कि ज़िंदा रहने से बद-तर सज़ा क्या है मोहब्बत की थी जब 'रेहान' मर्ज़ी से तो फिर दिल टूट जाने का गिला क्या है — Rehaan
ये क़लम सब कुछ ही लिख जाए ज़रूरी तो नहीं हर दफ़ा काग़ज़ भी भर पाए ज़रूरी तो नहीं ख़त अधूरा हो भले ही अर्थ गहरा रखता है पर समझ हर एक को आए ज़रूरी तो नहीं कुछ सफ़र जाते हैं बेशक हादसों की ओर भी राह हर मंज़िल को ही जाए ज़रूरी तो नहीं मुझ को ये दुनिया समझती है बहुत शादाब हूँ ज़ख़्म सब आँखों को दिख पाए ज़रूरी तो नहीं कुछ परिन्दें रात भर यूँँ ही भटकते हैं फ़िज़ूल हर परिंदा शमअ को पाए ज़रूरी तो नहीं फूल भी कुछ ज़िन्दगी भर की चुभन दे जाते हैं चोट बस काँटों से ही आए ज़रूरी तो नहीं माना तुम पर चढ़ रहा है रंग गहरा इश्क़ का पर नशा मुझ पर भी छा जाए ज़रूरी तो नहीं आशिक़ी इक भूल है 'रेहान' कहते फिरते हो कोई हर ग़लती पे पछताए ज़रूरी तो नहीं — Rehaan
बंगलें तुम्हीं सँभालो मुझ को फ़क़ीर घर दो बेचैन हो गया हूँ कोई नया सफ़र दो दिल्ली या हस्तिनापुर सब हो तुम्हें मुबारक मुझ कृष्ण-भक्त को बस वीरान इक नगर दो मेरे रियाज़ में तुम मेरी नमाज़ में तुम मेरे लिए ख़ुदा हो सज्दों को कुछ असर दो मेरी दुआ भी तुम हो मेरी दवा भी तुम हो बस तुम गले लगा लो कोई न चारा-गर दो ये शा'इरी भी ले लो ये गायकी भी ले लो जो रास आए तुम को ऐसा कोई हुनर दो फिर बात कर लो मुझ सेे फिर साथ चल लो मेरे फिर तोड़ दो ये दिल तुम फिर से ये आँख भर दो शायद नहीं अरे वो लेकिन मगर ये क्या है इन सब से अच्छा तो तुम सीधा मना ही कर दो ऐ राएगाँ बहारों ऐ फ़ज्र के सितारों उस दिल-शिकन को जा कर 'रेहान' की ख़बर दो — Rehaan
प्यार फिर झूठा जताने लौट कर वापस न आ अब याद यूँँ मुझ को न कर तू यूँँ न तू मुझ को सता अब दे न यूँँ मुझ को सज़ा जुर्म-ए-वफ़ा की बे-वफ़ा तू ये फ़रेब-ए-दम दिखा कर और मत दिल को दुखा अब जाहिलों ने इस-क़दर भटका दिया है ज़ाहिदों को हर तरफ़ बर्बादियाँ हैं गर करे भी दिल तो क्या अब बह गए जज़्बात सारे साथ मेरे आँसुओं के कुछ बचा मुझ में कहाँ जो कर सकूँ तुझ पे फ़ना अब थी शिकायत ये ख़ुदा बस चार दिन की ज़िन्दगी दी संग जो कुछ पल बिताएँ है नहीं ये भी गिला अब पूछना मुझ सेे न कोई है किधर मेरा ठिकाना खो गया हूँ मैं कहाँ ख़ुद है नहीं मुझ को पता अब माँ को दुख है क्यूँँ महीनों बात मैं करता नहीं हूँ है बना मुझ को दिया इस इश्क़ ने कितना बुरा अब है क़सम 'रेहान' उस की जिस की ख़ातिर लिखते हो तुम गर कभी मिल जाए वो मुड़ के न उस को देखना अब — Rehaan
राम सी सीरत कहाँ अब कृष्ण सी उल्फ़त कहाँ सब फ़रेबी हैं किसी में अब कोई ग़ैरत कहाँ प्रेमिका बेटी बहन बेशक सभी अच्छी हैं पर माँ के जैसी इस जहाँ में कोई भी औरत कहाँ डेढ़ दिन की ज़िन्दगी ने बस यही सिखलाया है जुस्तुजू में जो मज़ा मंज़िल में वो इशरत कहाँ साथ तेरे अब हर इक लम्हा गुज़रता है मेरा तुझ सेे मिलने के लिए अब नींद से मिन्नत कहाँ सब बुलाते हैं मुझे बे-वजह दीवाना तेरा मेरी शोहरत भी सनम अब है मेरी शोहरत कहाँ जो शिकस्त-ए-दिल से डर जाते हैं उन को क्या ख़बर इज़्तिराब-ए-इश्क़ से बेहतर कोई लज़्ज़त कहाँ हर दुआ में कल तलक माँगी थी बस ख़ुशियाँ तेरी आज अचानक बद-दुआ दूँ मेरी ये फ़ितरत कहाँ भूल से भी वस्ल की ग़ज़लें लिखी मैं ने अगर लोग समझेंगे कि अब 'रेहान' को ज़हमत कहाँ — Rehaan
फिर दो दिलों में अहद को ले कर लड़ाई हो गई फिर बैठे-बैठे हिज्र की अच्छी कमाई हो गई हम बे-ख़ुदी में रात भर किस सेज पर सोए रहें हम को गिला है हम सेे शायद बे-वफ़ाई हो गई इक हम थे जो मंडप से अपनी उठ गए थे बीच में और उस ने सीधा कह दिया अब तो सगाई हो गई इस इश्क़ के शतरंज में राजा भी मैं रानी भी मैं फिर हुस्न की सीरत से आज इस पर लड़ाई हो गई जिस को ख़ुदा से माँगने में उम्र सारी कट गई वो ख़ुश-बदन पल भर में ही हम सेे पराई हो गई हम चूड़ियाँ लाने गए थे शहर से उस के लिए वापस जब आए तो सुना उस की विदाई हो गई कमरा मेरा कुछ देर पहले था बहुत बिखरा हुआ कुछ फूल फेंके ख़त जलाएँ और सफ़ाई हो गई रेहान उस ने हाथ रक्खा कल मेरे सीने पे तो ऐसा लगा पिंजरे से पंछी की रिहाई हो गई — Rehaan
निगाहों ने कभी कोई ख़िज़र नहीं देखा सफ़र के ख़ब्त में शाम-ओ-सहर नहीं देखा कहा था ग़ुस्से में घरवालों ने चले जाओ मैं भी गया यूँँ कि फिर लौट कर नहीं देखा ये मुझ सेे अब मेरे घरवालों को शिकायत है कि एक अर्सा हुआ मैं ने घर नहीं देखा मैं लड़का बिगड़ा हुआ हूँ मगर बता रहा हूँ कभी हवस से तुम्हें आँख-भर नहीं देखा तुम्हारे फूल का काँटा यूँँ चुभ गया मुझ को कि मैं ने फिर कभी कोई शजर नहीं देखा तुम्हारे बा'द मैं कुछ इस-क़दर परेशाँ हूँ मुझे किसी ने कभी इस-क़दर नहीं देखा मुझे तो एक तवायफ़ भी कल ये कह के गई तुम्हारे जैसा कोई मुंतशर नहीं देखा शराब का नशा सिगरेट की तलब 'रेहान' किसी ने मुझ में कभी ये हुनर नहीं देखा — Rehaan
तुम्हारा ग़म भुला कर के ये दिल आबाद करना था कि ख़ुद को इश्क़ की ज़ंजीर से आज़ाद करना था बिखर जाने से अच्छा था कि फिर से दिल लगा लेते फ़क़त रस्म-ए-वफ़ा को छोड़ ख़ुद को शाद करना था न सोचा था तड़पना भी पड़ेगा इश्क़ में इक दिन ख़ुदा से वस्ल की ख़ातिर न यूँँ फ़रियाद करना था किया था इत्तिला सब ने हमें तुम छोड़ जाओगी ये दिल पागल इसे ख़ुद को मगर फ़रहाद करना था तुम्हें मालूम था हम टूट जाएँगे तुम्हारे बा'द तुम्हें तो पर शुरू से ही हमें बर्बाद करना था हमें अब काम में कुछ इस क़दर मसरूफ़ होना है कि अब ये भी न याद आए कि तुम को याद करना था सुनाया था सभी को दुख पिरो कर शे'र में हम ने मगर परवाह क्या उन को तो बस इरशाद करना था सुनो 'रेहान' मत कहना कि था वो कौन सा इक शहर दु'आओं में तुम्हें जिस को इलाहाबाद करना था — Rehaan
हर घड़ी बस इक तुझे ही देखना है सोचना है हर घड़ी ये दिल मेरा तुझ सेे ही मिलने को फ़ना है इल्तिजा है ये कि फिर से लौट आ तू पास मेरे इक दफ़ा मुझ को भी शहज़ादी तेरा दिल तोड़ना है ख़ुश-नसीबी है कि सबके सामने है फ़ैसला अब सच तुझे भी बोलना है सच मुझे भी बोलना है कोई मुझ को भी कहीं से ला दे अफ़्सूनी तराज़ू कौन कितने साफ़ दिल का नापना है तौलना है मेहरबानी सादगी रस्म-ए-वफ़ा नेकी शराफ़त अब मुझे बेकार का ये सब झमेला छोड़ना है क्या हया क्या शर्म पहला प्यार पूरा हो न पाया दूसरा फिर तीसरा अब सब सेे रिश्ता जोड़ना है एक खिड़की से न होगी ज़िन्दगी रौशन मेरी अब अब मुझे हर एक खिड़की पर का पर्दा खोलना है मुझ में जो 'रेहान' है मुझ को बिगड़ने ही न देगा मुझ में जो 'रेहान' है उस का गला अब घोंटना है — Rehaan
इल्तिजा तुम सेे ज़माने पर ज़रा एहसान करना भूल कर भी तुम न ख़ुद को अब किसी की जान करना ख़ुद-कुशी भी कर नहीं पाते हैं बेचारे ये आशिक़ फिर न तुम आगे किसी के वास्ते रमज़ान करना एक ग़म ये है कि मुझ सेे क्यूँँ नहीं मिलती हो अब तुम एक डर है गर मिलो तो दिल न ये नुक़्सान करना फिर वही काबा-ओ-काशी फिर वही वस्ल-ओ-जुदाई दो दिलों को फिर न यूँँ मज़लूम ऐ भगवान करना बन सको मेरी कभी तुम रह गई ख़्वाहिश अधूरी दूर जा मुझ सेे फ़क़त अब मुश्किलें आसान करना है दुआ बस ये ख़ुदा फिर यूँँ दिखा कर ख़्वाब झूठे इश्क़ में फिर से न कोई ज़िंदगी शमशान करना — Rehaan
कहीं तो लोग सब ख़ुशियाँ मनाते हैं दिसम्बर में कहीं पे लोग अपनों को गँवाते हैं दिसम्बर में ठिठुरता है कोई मजबूर भूखा ठंड में दिन-रात कहीं सब शौक़ से कैंडल जलाते हैं दिसम्बर में न दिन में ही कोई रौनक न कोई शोर रातों को कि जितने गाँव हैं सब रूठ जाते हैं दिसम्बर में किए थे जो भी वादे जनवरी में जिस किसी से भी वो वादे लोग सारे तोड़ आते हैं दिसम्बर में जो जुड़ जाते हैं दो दिल यूँँ ही भीतर एक छाते के वो दिल फिर बिस्तरों पे टूट जाते हैं दिसम्बर में जो बीती फ़रवरी मरते थे इक दूजे से मिलने को वो मिलने पर भी अब नज़रें चुराते हैं दिसम्बर में कईं ख़ुश हैं कि आनी फ़रवरी फिर तो कईं ऐसे जो बीती फ़रवरी का ग़म भुलाते हैं दिसम्बर में हुआ जो कुछ भी पूरे साल भर 'रेहान' वो सारे गिले-शिकवे पुराने याद आते हैं दिसम्बर में — Rehaan
दिल को कब तक यूँँ तेरी याद में तड़पाऊँ मैं है मुझे अब ख़ुशी क्या जो कभी मुस्काऊँ मैं यूँँ ही तस्वीरों में कब तक मैं निहारूँ तुझ को आँखों को कितना तेरे वास्ते तरसाऊँ मैं है ये बेहतर कि मैं दिल फिर से लगा लूँ कहीं पे भूलने से तुझे अब किस लिए घबराऊँ मैं कैसे भूलूँगा तुझे मैं ये नहीं फ़िक्र मुझे है मुझे डर कि कहीं टूट न फिर जाऊँ मैं ख़ुद की भी ख़ूबियों से है बड़ी नफ़रत मुझे अब है बहुत ख़ूब वो कैसे उसे अपनाऊँ मैं एक ही बे-वफ़ा काफ़ी है कहानी के लिए लगा कर दिल कहीं क्यूँँ बे-वफ़ा कहलाऊँ मैं स्वाद जो चख लिया इक बार मोहब्बत का जब फिर से क्यूँँ एक दफ़ा ज़हर वही खाऊँ मैं जान-ए-जाँ बा'द तेरे मर गया आशिक़ तेरा हूँ मैं 'रेहान' ये कैसे तुझे समझाऊँ मैं — Rehaan

Nazm

ग़लत-फ़हमी भले दिनों की बात है भला सा एक शहर था ग़मों के उस दयार में फ़लक से उतरी अप्सरा थी शक्ल से बहार वो गुलाब जैसे गाल थे थी चाल उस की नदियों सी कि रेशमी से बाल थे अदब था उस में इस-क़दर कि शर्म भी हया करे वो आए सज के सामने तो चाँद भी गिला करे वो जिस दिशा भी चल पड़े हज़ार भॅंवरे हम-सफ़र कि हर रक़ीब लड़ पड़े वो देख ले पलट के गर ग़मों के उस दयार से ग़मों ने फिर विदा लिया कि दिल-कशी सी छा गई यूँँ इश्क़ ने असर किया ये उन दिनों की बात है मैं बे-ख़बर था इश्क़ से वो दोस्तों की दास्ताँ मज़ाक़ थी मेरे लिए मगर मेरे नसीब में थीं बद-दुआएँ इश्क़ की सो एक रोज़ यूँँ हुआ कि रू-ब-रू वो मिल गई भली सी इक वो शाम थी गुज़र रहा था मोड़ से न जाने क्या सितम हुआ कि आ गई वो सामने नज़र से यूँँ नज़र लड़ी कि वक़्त जैसे खो गया मैं क्या बताऊँ हाल-ए-दिल कि इल्म-ए-इश्क़ हो गया गली में उस की रात-दिन यही बस एक काम था कि उस के आशिक़ों में फिर मेरा भी एक नाम था पलट के उस को देखूँ मैं तो खुल के मुस्कुराए वो मैं भाने लग गया उसे मुझे भी रास आए वो ख़ुदा ने यूँँ ग़ज़ब किया कि बात होने लग गई मैं शे'र कहने लग गया वो ख़्वाब बोने लग गई मगर हुआ ये इल्म फिर कि हम थे इख़्तिलाफ़ में मैं इश्क़ के ख़ुमार में वो इश्क़ के ख़िलाफ़ में थी उस को चश्म-ए-दोस्ती मैं इश्क़ का नशा लिए तो कोशिशें शुरू हुईं कि रिश्ता ये बचा रहे मगर है सच ये बात भी कि कब तलक फ़िज़ूल में यूँँ इश्क़ के दरख़्त पे ये दोस्ती के गुल खिलें सो एक रोज़ क्या हुआ कि बात इस-क़दर हुई मैं इश्क़ पे अड़ा रहा कि दोस्ती बिखर गई मैं इश्क़ का दलाल था वो दोस्ती को रब कहे हर इक मेरी दलील को वो जिस्म की तलब कहे ये इश्क़-विश्क़ जाल है कि मुझ को इनसे बख़्श दो अगर क़ुबूल हो तुम्हें तो दोस्ती के ख़त लिखो है इश्क़ की तलब तुम्हें मैं हूँ अलग मिज़ाज की न शौक़ कुछ तबाही का मैं लड़की काम-काज की मैं दोस्ती निभाऊँगी ख़ुदा की है क़सम मुझे मगर जो ज़िद हो इश्क़ की तो भूल जाओ तुम मुझे न उस के दिल में इश्क़ था न मेरे दिल में दोस्ती मैं मोड़ पर खड़ा रहा वो छोड़ कर चली गई थी आँख नम अगर मेरी उसे भी कुछ मलाल था मिलेंगे फिर कभी न हम ये उस को भी ख़याल था सो यूँँ हुआ कि फिर हमें नसीब ने जुदा किया वो दोस्त के बिना रही मैं इश्क़ के बिना जिया वो क्या ख़बर कहाँ गई कि कुछ पता नहीं चला मैं उस की याद में मगर हज़ार शब जगा रहा मैं अपने ग़म की दास्ताँ सुनाता ही चला गया सुख़न थे जो फ़िराक़ के वो गाता ही चला गया ये आजकल की बात है हज़ार ग़म हैं सहने को क़लम अगर उठाऊँ तो न कुछ बचा है कहने को न क़ाफ़िए बचे हैं कुछ न कुछ रदीफ़ें रह गईं थीं ग़ज़लें जो भी पास में वो आँसुओं में बह गईं है बहर की समझ कहाँ जो नज़्म कोई कह सकूँ है शा'इरी कि बेबसी मैं क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ सो अब कुछ ऐसा हाल है कि कोई चारा-गर नहीं भला हूँ या बुरा हूँ मैं किसी को कुछ ख़बर नहीं न अब किसी से इश्क़ है न है किसी से दोस्ती है उस की शक्ल ज़ेहन में पता नहीं कभी-कभी — Rehaan
"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं — Rehaan
'इक बात' इक बात कि तुम सेे कुछ बात करनी है इक बात कि फिर इक मुलाक़ात करनी है इक बात कि तुम्हें इक नज़्म सुनानी है पुरानी तुम सेे कुछ रंजिशें बतानी हैं इक बात कि वापस सब याद दिलाना है तुम सेे मिला वो हर इक ज़ख़्म गिनाना है इक बात कि तुम सेे कुछ सवाल करने हैं तुम्हारी आँखों से कुछ जवाब पढ़ने हैं इक बात कि तुम ने क्यूँँ साथ छोड़ दिया बीच सफ़र में मेरा हाथ छोड़ दिया इक बात कि इस-क़दर क्यूँँ किया अन-देखा तुम ने इक बार भी न पलट कर देखा इक बात कि तुम ने क्यूँँ दिल ये तोड़ा क्यूँँ मुझ सेे अचानक यूँँ मुँह मोड़ा इक बात कि तुम सेे अब बात नहीं होती दिन गुज़रतें नहीं अब रात नहीं होती इक बात कि तुम बिन ये दिल बेहाल है तुम नहीं तो अब कुछ ऐसा हाल है जैसे बिन चाँद-तारों की रात जैसे दूल्हे बिना बारात जैसे बिन गद्दी के राजा जैसे कफ़न बिना जनाज़ा जैसे बिन हिन्दी के हिन्द जैसे धूप बिना आलिन्द जैसे बिन साहिल के नदी जैसे इतिहास बिना कोई सदी जैसे बिन धड़कन के दिल जैसे संगीत बिना महफ़िल जैसे बिन प्यास के सजल जैसे बहर बिना कोई ग़ज़ल जैसे बिन मिलन के प्रीत जैसे धुन बिना कोई गीत जैसे बिन सिया के राम जैसे राधा बिना घनश्याम जैसे बिन मदन के रति जैसे शिव बिना पार्वती जैसे बिन पानी के मीन जैसे फ़सल बिना ज़मीन जैसे बिन बारिश के मोर जैसे सूई बिना कोई डोर जैसे बिन औषधि के चोट जैसे लफ़्ज़ बिना ये होंठ इक बात कि लबों पे कुछ बोल सजाने हैं इक बात कि कुछ पल फिर संग बिताने हैं इक बात कि तुम्हीं को फिर ख़्वाबों में तकना है दिन-रात बस तुम्हें ही ख़यालों में रखना है इक बात कि फिर तुम्हें सोच मुस्कुराना है हर एक चेहरे में फिर तुम्हीं को पाना है इक बात कि तुम सेे इक इनायत लेनी है सात फेरों की तुम सेे इजाज़त लेनी है इक बात कि तुम सेे फिर दिल लगाना है तुम्हें फिर से अपना ख़ुदा बनाना है इक बात कि तुम सेे सब शिकवे मिटाने हैं फिर से तुम पर दो जहाँ लुटाने हैं इक बात कि तुम्हारा फिर दिल धड़काना है मुझे फिर तुम्हारे सपनों में आना है इक बात कि तुम्हें दिल के जज़्बात बताने हैं तुम्हारे साथ ही सातों जनम बिताने हैं इक बात कि मिलने आओ गर तुम तो साथ इक जनम भी निभाओ गर तुम तो शीशे का इक आशियाँ बना दूँ चादर फ़र्श पे मख़मली बिछा दूँ आलम से बहारें चोरी कर लूँ दोस्ती तितलियों से पूरी कर लूँ मद्धम-सी कोई धुन चला दूँ कलियाँ चारों ओर खिला दूँ नदियों की चाल आहिस्ता कर दूँ मुकम्मल साहिलों का रिश्ता कर दूँ फ़िज़ाओं में ढेरों इत्र मिला दूँ ख़ुशबूएँ हर तरफ़ फैला दूँ शाम को देर तक ढलने न दूँ मन पंछियों का मचलने न दूँ बेवक़्त शबनम की बूँदें बरसा दूँ पत्तियों के दिल की प्यास बुझा दूँ हो अँधेरा तो शमा' रौशन कर दूँ तेज़ परिंदों की धड़कन कर दूँ चाँद को ज़मीं पे बुला दूँ महफ़िल फूलों से सजा दूँ आसमाँ से सितारें हज़ार ले लूँ बारिश घटाओं से उधार ले लूँ मौसम में नमी भर दूँ चंचल-शीतल हवाएँ कर दूँ फ़लक में सातों रंग घोल दूँ चौखटें जन्नत की सारी खोल दूँ इक बात कि तुम्हारे नाम जन्नतें सजानी हैं इक बात कि तुम्हें अनगिनत ता'रीफ़ें सुनानी हैं इक बात कि तुम्हारी बातों में नशा है ज़ुल्फ़ें कि जैसे कोई काली घटा है इक बात कि कितना मासूम है चेहरा आँखों में छुपा हो राज़ कोई गहरा इक बात कि कोई भी होश खो जाए चाँद भी देखे तो दीवाना हो जाए इक बात कि तुम्हें झुमकें पहनाने हैं नाज़ुक-से हाथों पर कंगन चढ़ाने हैं इक बात कि पैरों में पायलें बाँधनी हैं अब इश्क़ की सारी दहलीज़ें लाँघनी हैं इक बात कि तुम्हारी पलकों को चूमना है संग तुम्हारे फिर से बारिशों में झूमना है इक बात कि तुम्हें भरना है बाहों में घंटों फिर यूँँ ही रखना है निगाहों में इक बात कि तुम सेे फिर बात करनी है आओ कि फिर इक मुलाक़ात करनी है — Rehaan
"ज़रूरी था" भूलना भी था ज़रूरी तुझे तो इस लिए फिर इश्क़ में जलते चराग़ों को बुझाया हम ने सोच कर ये कि तेरी याद नहीं लाज़िम अब दिल से अपने तेरी यादों को हटाया हम ने मोहब्बत के मलालों से उबरना भी ज़रूरी था मुरादें भी ज़रूरी थीं समझना भी ज़रूरी था ज़रूरी था कि यादों को सँभाले रखते दिल में हम मगर यादों का फिर दिल से निकलना भी ज़रूरी था हैं हम को याद शा में जो तेरी गलियों में बीती थीं हमारा दिल जहाँ हारा था नज़रें तेरी जीती थीं वो तेरा हम को मुड़कर देखना केवल बहाना था असल में तो तेरा मक़्सद हमारा दिल दुखाना था मगर हम देर से समझे अदाएँ वो नुमाइश थीं तेरी गलियों से बिन देखे गुज़रना भी ज़रूरी था किसी मंज़िल सफ़र की अब नहीं रहती ख़बर हम को कोई उम्मीद की लौ भी नहीं आती नज़र हम को मोहब्बत की ख़ता की थी सज़ाएँ पानी थी पा लीं किए कितने सितम ख़ुद पे कि कितनी ठोकरें खा लीं तेरे ग़म के सताएँ हम कभी रोए कभी तड़पे मगर तड़पे तो याद आया तड़पना भी ज़रूरी था — Rehaan
'आशिक़ी(ख़्वाब, हक़ीक़त और ख़ुदा)' कोई सूरत नज़र को लुभा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़ुशबू साँसों को भा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी सरगम लबों पे छा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़्वाब दिल में समा जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है मेरा ख़्वाब था कि तुझे भाया करूँँ तेरे सपनों में मैं आया करूँँ बचाकर चाँद-सितारों की नज़र से तुझे फ़लक की सैर पे ले जाया करूँँ इस क़दर तू मुझ सेे प्यार करे मेरे फ़रेब पे भी ऐतिबार करे कभी राधा बनके तो कभी मीरा बनके हर जनम बस मेरा ही इंतिज़ार करे तू मुश्किलों में मेरा साया बने मुझे धूप लगे तो छाया बने जब हार जाऊँ मैं उम्मीदें सभी तू ईश्वर की कोई माया बने कोई माया ईश्वर भी पिरो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई दिल ग़र चैन से सो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी आँखें खुल के रो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ख़्वाब हक़ीक़त हो न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है इक हक़ीक़त जिस ने बस सितम किया हर बार आँखों को नम किया तुझे कितना मैं ने चाहा मगर तू ने न मुझ पर कोई करम किया तेरे इंतिज़ार में सदियाँ बीती मेरी हर ख़ुशी ज़िन्दगी से रूठी मेरी उम्मीदें सब सिमट कर रह गई बस तमन्नाऍं कुछ यूँँ टूटी मेरी अधूरा ख़्वाहिश-ए-गुलाब रह गया मेरा ख़्वाब बस इक ख़्वाब रह गया न हो सका वो मुकम्मल कभी बिन चकोर के ही मेहताब रह गया कोई चाँद चकोर बिन रह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई काफ़िर नज़्में कह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी आँख से पानी बह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई बिन बोले सब सह जाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई कितना सहे ये बता दे ख़ुदा मेरा इश्क़ मुझे अब लौटा दे ख़ुदा छट जाए अँधेरा हर ख़ुशी से मेरी कोई ऐसी रौशनी तू दिखा दे ख़ुदा मेरी मन्नतों का तू लिहाज़ कर मेरे पागलपन का इलाज कर मैं करता फिरूँ शुक्रिया तेरा कुछ ऐसा मेरा मिज़ाज कर मुझे फिर कोई ग़म न सता सके वो मुझ सेे नज़रें न हटा सके जुड़ जाए धड़कनें कुछ इस तरह उस दिल से न कभी कोई मिटा सके कोई धड़कन दिल से बिछड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई ग़लतियों पे भी झगड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कभी ख़ुदा भी ज़िद पे अड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है कोई रिश्ता युगों तक उजड़ न पाए तो उसी का नाम आशिक़ी है — Rehaan
'आज फिर तेरी याद आ रही है' आज फिर तेरी याद आ रही है ये तक़दीर मुझे तेरी ओर ले जा रही है मेरे ज़ेहन में फिर से तेरी सूरत समा रही है मेरे कानों में फिर तेरी आवाज़ गुनगुना रही है मेरी आँखों से नींद फिर रूठ सी गई है मेरी ज़िन्दगी से हँसी कुछ छूट सी गई है मेरे चेहरे पे जैसे इक उदासी सी छाई है इन होंठों पे फिर कोई ख़ामोशी घिर आई है न जाने ये दिल मेरा कहाँ खो गया है आज फिर पूछ रहे हैं लोग ये मुझे क्या हो गया है मेरे लबों ने फिर वही बातें दोहराई हैं कुछ नहीं हुआ कह कर मैं ने पलकें झपकाई हैं आज फिर मैं ने दुनिया से अपना हाल छुपाया है ये दिल मायूस है मगर होंठों ने मुस्कुराया है आज फिर मेरे हँसते दिल को उन ग़मों ने पुकारा है मेरे भीतर के चकोर ने फिर चाँद को घंटों निहारा है आज फिर बहती फ़िज़ाओं ने मुझ सेे मुँह फेरा है आज फिर अकेलेपन ने मेरे मन को घेरा है ढ़लती शाम ने फिर आँखों को सताया है बरसती घटाओं ने फिर बाहों को तरसाया है ये क़ुदरत मुझ पर फिर से क़हर बरपा रही है हर धड़कन मेरी फिर से तुझे पास बुला रही है आज फिर तेरी याद आ रही है — Rehaan
'फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है' फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है ख़्वाब सारे टूट कर कहीं सिफ़र जाने को हैं घोंसला वहम-ओ-गुमान का फिर से उजड़ जाने को है ज़ख़्म वो पुराने फिर निखर आने को हैं सारा जहाँ मानो गहरी नींद में सो गया है ये मन मेरा फिर उन हसीं यादों में खो गया है क़लम जैसे फिर कोई नज़्म लिखने की ज़िद पे अड़ी है शरीफ़ दिल की ये आदत आज भी बहुत बुरी है आँखों से नींद फिर गुम सी गई है सीने में धड़कन जैसे थम सी गई है ये चंचल हवाऍं ये गुम सुम घटाऍं मुझे ख़ुद से कहीं दूर ले जा रही हैं वो सुनसान सड़कें वो वीरान गलियाँ मुझे फिर से अपने पास बुला रही हैं हरेक परवाने को जैसे बस शमा' की तलाश है लहरों के मन में भी कोई अधूरी सी प्यास है सितारे अब चमक चमक कर थक से गए हैं पत्ते भी पूरी तरह शबनम से लिपट गए हैं वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा है चाँद तेजी से फ़लक की ओर बढ़ रहा है ये सुकून-ए-अँधेरा फिर से उतर जाने को है ये ख़ूब-सूरत नज़ारे फिर से बिखर जाने को हैं फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है — Rehaan
अफ़सोस मुझे अफ़सोस है तुम को मोहब्बत हो गई मुझ सेे ये क्या जादू हुआ है जो मैं क़ाबिल हो गया हूँ आज तुम्हें तो कल शिकायत थी कि मुझ में बस बुराई है तुम्हें अब चाहिए दो ज़िन्दगी इक साथ में गुज़रे तो कल क्यूँँ सोचती थी तुम मोहब्बत इक तबाही है ये क्या मतलब कि कल तक थी फ़क़त तुम को ग़लत-फ़हमी ये तुम ने आज जाना है कि उल्फ़त में ही जन्नत है मैं कैसे मान जाऊँ अब तुम्हारा इश्क़ सच्चा है भला कैसे यक़ीं हो वाकई तुम को मोहब्बत है वो दिल का टूटना मेरा कहो कैसे भुला दूँ मैं कि इस बेज़ार दिल में अब कहाँ तुम को जगह दूँ मैं सुनो ये मत समझना तुम कि मैं नाराज़ हूँ तुम सेे न ही कुछ बात ऐसी है कि मुझ को तुम सेे नफ़रत है न है तुम सेे कोई रंजिश न कोई चाह बदले की मुझे तो आज भी तुम सेे सनम बेहद मोहब्बत है मेरा हँसना-हँसाना भी फ़क़त बस है अदाकारी अगर तुम आज भी चाहो मैं ख़ुद को ग़म-ज़दा कर लूँ मेरी जो नज़्म है वो सब तुम्हारी मेहरबानी है जो तुम इक मर्तबा कह दो क़लम तुम पर फ़ना कर दूँ मेरी नज़रों में तुम अब भी ख़ुदा की वो ही मूरत हो कि सूखे फूल खिल जाएँ तुम इतनी ख़ूब-सूरत हो मगर वो आशिक़ी जो बस मिलन की शाख़ पे पनपे मैं ऐसे उम्र भर के साथ से इनकार करता हूँ मैं वो आशिक़ नहीं हूँ अब जिसे थी आरज़ू-ए-वस्ल मैं तुम को हिज्र में भी ख़ुद से ज़्यादा प्यार करता हूँ कभी सोचो सबब इस एक-तरफ़ा आशिक़ी का तो तुम्हारी ही नज़र-अंदाज़ी की ये शुक्र-ए-नेमत है यूँँ शेर-ओ-शायरी ने इश्क़ के सब मायने बदले कि तुम सेे इश्क़ है पर साथ रहने में अज़िय्यत है बस इक एहसान कर दो मुझ सेे तुम नाराज़ हो जाओ तुम्हें मेरी क़सम तुम फिर से ख़ुश-अंदाज़ हो जाओ मुझे अफ़सोस है तुम को मोहब्बत हो गई मुझ सेे — Rehaan
“अभी न जाओ छोड़ कर” अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं नज़र अभी लड़ी नहीं नशा अभी चढ़ा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं अभी तो दिन ढ़ला है ये अभी तो रात आई है अज़ल के बा'द आज फिर फ़ज़ा ये मुस्कुराई है फ़ज़ा को मुस्कुराने दो ये दिल बहक भी जाने दो कि अब न रोको ख़ुद को तुम ये दूरियाँ मिटा दो तुम हवाओं में ये दिल उड़े कि प्यार के चमन खिलें ये रात भी दिवानी है फ़ज़ा भी ये सुहानी है कि बाहों में मुझे भरो यूँँ जाने की न ज़िद करो अभी तो देखो चाँद भी चकोर से मिला नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं ज़रा ठहर भी जाओ साथ बैठ लो कुछ और पल कि थाम लूँ ये वक़्त मैं कि लिख दूँ फिर कोई ग़ज़ल तुम्हें बताऊँ आज जो कभी न तुम सेे कह सका तुम्हें दिखाऊँ अश्क जो तुम्हारे बिन न बह सका हसीन हो गई हो तुम जवान हो गया हूँ मैं बहार बन गई हो तुम मसान बन गया हूँ मैं कि कर दो अब हरा मुझे ग़मों से अब रिहा मुझे तरस ज़रा तो खाओ तुम मैं इतना भी बुरा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं — Rehaan
'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ' अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है अस्ल में तो तुम सेे मिलना चाहता हूँ तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम सेे तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँँ बता रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ — Rehaan
'ऐसा क्यूँँ होता है' ऐसा क्यूँँ होता है जाता है कोई तो लौट के फिर न वो आता दुबारा ऐसा क्यूँँ होता है चंदा के जाने से लगता फ़लक ये सूना सारा दुनिया ये प्यार की दुश्मन इस सेे न पार पाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है मौला अपनों से हार जाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है दिल जो बिछड़ते हैं दिन न गुज़रते हैं शा में न कटती हैं रातें न छटती हैं लगता नहीं कहीं दिल ये बेचारा ऐसा क्यूँँ होता है रहती हैं आँखें नम हो नहीं पाता है गुज़ारा वादे किए थे उस ने जो वादे थे उस के सारे झूठे जितना उसे था कल चाहा ख़ुद से हैं आज उतने रूठे ऐसा क्यूँँ होता है भूलना चाहूँ तो दिल को मनाऊँ तो दिल न समझता है मुझ सेे उलझता है करता है उस पे ही बस ये इशारा ऐसा क्यूँँ होता है जब भी यूँँ होता है दिल ये हो जाता बे-सहारा — Rehaan
“ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो” ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो स्वजन हो साथी हो बोलो आख़िर तुम कौन हो अगर हो आशिक़ मेरी तो फिर तुम अबतक क्यूँँ मौन हो निश्चित ही तुम मोहब्बत के इज़हार से डरती हो जब कहने में इतनी दिक़्क़त है तो प्यार क्यूँँ करती हो कहीं डरती तुम उस न से तो नहीं जो बयान-ए-इश्क़ पे सुनना पड़े मोहब्बत भी पूरी न हो और नया साथी भी ढूँढ़ना पड़े पर ये भी तो सच है ना मोहब्बत में दोस्ती सराब है इक बार मोहब्बत हो जाए तो बस दोस्त रह पाना ख़्वाब है ख़ैर छोड़ो ये फ़िज़ूल की बातें चलो बस इतना ही बता दो क्यूँँ कर बैठी मोहब्बत मुझ सेे इस राज़ से तो पर्दा हटा दो सीधा दिल ही लगा बैठी मुझ में ऐसा भी क्या देख लिया तुम ने जो ख़ूबियाँ तुम ने देखी हैं काश! कभी तो देखा होता उस ने अब पढ़ ही लिया है आँखों को मेरी तो क्यूँँ न मुझ पर एक एहसान कर दो जिस नज़रिए से तुम ने देखा है मुझे वो सलीक़ा उस को दान कर दो वो पढ़ सके दिल को मेरे ये अज़ीज़ हुनर तुम उसे भी सीखा दो इस फ़रेब-ए-दुनिया के अँधेरे में एक रौशनी मोहब्बत की तुम उसे दिखा दो माना कि मैं लड़का हूँ पर ज़िन्दगी मेरी भी आसान नहीं कभी देखो ग़ौर से चेहरे को मेरे इस पे पहले-सी वो मुस्कान नहीं अब तुम ही कोई चमत्कार दिखा दो इस राँझे की मुस्कान लौटा दो ढूँढ़ कर तुम पता कहीं से मेरी हीर को मेरा हाल बता दो वो मिल जाए तुम्हें तो अच्छा है न मिले तब भी कोई गिला नहीं तुम लौट जाना घर को अपने सोचना मैं तुम सेे कभी मिला नहीं समझकर इक फ़िज़ूल ख़्वाब तुम इस अनचाह क़िस्से को भुला देना घोंटकर गला जज़्बात का अपने अरमानों को तुम सुला देना बड़ी मुश्किल से सॅंभाला है ख़ुद को मुझे दोबारा तोड़ने न आना कहीं और दिल लगा लेना तुम मुझ सेे रिश्ता जोड़ने न आना जिस मिलन की तुम को हसरत है वो मिलन कदाचित सम्भव नहीं दिल लगाने को बेचैन हो तुम तुम्हें दिल टूटने का अनुभव नहीं ये दोबारा दिल लगाने का हुनर मुझे रास नहीं आता टूटे दिल को मोहब्बत का अब कोई एहसास नहीं भाता कैसे हाँ कह दूँ मैं तुम को जब दिल में मेरे कोई आहट नहीं बस तुम्हारी ख़ुशी को ख़ुदा मान लूँ क्या मेरी अपनी कोई चाहत नहीं मोहब्बत से मैं समझौता कर लूँ नहीं मुझ को ये मंज़ूर कभी बस दिल बहलाने को दिल लगा लूँ नहीं इतना मैं मजबूर अभी माना कि हूँ थोड़ा टूटा मगर किसी हमदर्दी की चाहत नहीं तुम्हारा होना भी एक डर है इस मौजूदगी से मुझे कोई राहत नहीं बस भी करो यूँँ याद करना मुझे ये मुसलसल हिचकियाँ अब सही नहीं जातीं बे-दर्द ये बे-रुख़ी बातें बार-बार मुझ सेे अब कही नहीं जातीं न जाने क्यूँँ मेरी ख़ातिर तुम अपनों से फ़साद करती हो मुझ काफ़िर के इश्क़ में ख़ुद को क्यूँँ नाशाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो — Rehaan
"मासूम ख़ून" जिन आँखों से ख़ुशी बहती थी उन में ख़ौफ़ भर डाला मेरे हाथों ने इक मासूम बच्चा क़त्ल कर डाला वो हँसता था हँसाता था सभी को और मुझ को भी ज़माने की न कोई फ़िक्र वो सबका दुलारा था वो इक बच्चा मुझे सारे जहाँ में सब सेे प्यारा था थी क्या ही उम्र उस की था अठारह का अभी बस वो वो मेरा चाँद था लेकिन लगा मुझ को अमावस वो उसे कुछ और दिन जीना था हँसना-खेलना था पर मेरे बेज़ार दिल ने बचपना उस का कुतर डाला मेरे हाथों ने इक मासूम बच्चा क़त्ल कर डाला मुझे जब मेरी ही नाकामियाँ डसने लगी इक दिन अचानक तब मुझे उस की ख़ुशी चुभने लगी इक दिन किया सौदा फिर उन नाकामियों का उस की ख़ुशियों से सभी नाकामियों का बोझ मैं ने उस के सर डाला मेरे हाथों ने इक मासूम बच्चा क़त्ल कर डाला — Rehaan
'तुम पूछते हो कि वो क्या है' तुम पूछते हो कि वो क्या है क्यूँँ उस पर दिल मेरा यूँँ फ़िदा है मैं करता हूँ बस बातें उसी की जाने मुझे ये हो क्या गया है मेरी ग़ज़ल-शायरी में बस नाम उसी का वो राधा और मैं बस श्याम उसी का लगे है जग झूठा बस वो ही एक सच्ची सूरत कि जैसे कोई मासूम-सी बच्ची वो हँसे तो होंठों से फूल झरे निगाहें बस उसी को ढूँढा करें वो देखे तो लगतें हसीं लम्हात हैं सँवारे जब ज़ुल्फ़ें तो क्या बात है वो जान है मेरी वो मेरी महरम है ता'रीफ़ें जितनी भी करूँँ उस की कम हैं वो सितारों का आसमाँ वो बहारों का गुलिस्ताँ वो पूनम की चाँदनी कोई दिलकश-सी रागिनी वो जाड़े की धूप वो अप्सरा का स्वरूप वो ग़ालिब की ग़ज़ल वो राधा-सी सरल वो सरस्वती की वीणा और मीरा का एकतारा वो गंगा-सी पावन और यमुना की धारा वो परियों की रानी वो संगम का पानी वो तुलसी-सी पवित्र उस का सीता-सा चरित्र वो मुरली की तान वो वेदों का ज्ञान वो फूलों-सी कोमल है चंदन-सी शीतल वो मथुरा की सुब्ह और अवध की शाम वो बनारस की गलियाँ और वो ही चारों धाम है ख़ूब-सूरत वो उस में हया भी है वो दवा भी है वो दुआ भी है हैं रातें उसी से उसी से सवेरा वो रूठे तो छा जाए जग में अँधेरा वो बोले तो फ़िज़ाएँ बहना छोड़ दें शाइ'र भी शा'इरी कहना छोड़ दें वो चाहे तो चाँद को ज़मीं पे बुला दे घटाओं से कहीं भी बारिश करा दे वो मुस्कुराए तो मौसम ख़ुश-नुमा हो जाए हर मुसाफ़िर उस का रहनुमा हो जाए वो जैसे कि फ़रवरी का महीना है है काशी वो वो ही मदीना है वो छठ भी है वो रमज़ान भी है वो गीता भी है वो क़ुरान भी है वो लड़की नहीं वो मेरी ख़ुदा है और तुम पूछते हो कि वो क्या है — Rehaan