पास फिर तुझ को बुलाना चाहता हूँ
इक दफ़ा फिर दिल लगाना चाहता हूँ
कब तलक मैं यूँ ख़फ़ा तुझ से रहूँगा
अब ख़फ़ा ख़ुद से हो जाना चाहता हूँ
बात बस करता रहूँ कब तक मैं तुझ से
बात अब आगे बढ़ाना चाहता हूँ
ख़ूब-सूरत इस-क़दर है तू कि हर पल
तुझ को छूने का बहाना चाहता हूँ
हाथ तेरा थाम कर रक्खा है कब से
होंठ अब तेरे चबाना चाहता हूँ
पीठ पे नाख़ून लग जाए तेरा पर
दूरियाँ फिर भी मिटाना चाहता हूँ
इक ज़रा सी बात पे है शोर इतना
जैसे मैं कोई ख़ज़ाना चाहता हूँ
रास अब आता नहीं 'रेहान' मुझ को
मैं 'अमन' फिर से हो जाना चाहता हूँ
— Rehaan















