Rehaan
Rehaan
Nazm

'इक बात'

इक बात कि तुम से कुछ बात करनी है
इक बात कि फिर इक मुलाक़ात करनी है
इक बात कि तुम्हें इक नज़्म सुनानी है
पुरानी तुम से कुछ रंजिशें बतानी हैं
इक बात कि वापस सब याद दिलाना है
तुम से मिला वो हर इक ज़ख़्म गिनाना है
इक बात कि तुम से कुछ सवाल करने हैं
तुम्हारी आँखों से कुछ जवाब पढ़ने हैं
इक बात कि तुम ने क्यूँ साथ छोड़ दिया
बीच सफ़र में मेरा हाथ छोड़ दिया
इक बात कि इस-क़दर क्यूँ किया अन-देखा
तुम ने इक बार भी न पलट कर देखा
इक बात कि तुम ने क्यूँ दिल ये तोड़ा
क्यूँ मुझ से अचानक यूँ मुँह मोड़ा
इक बात कि तुम से अब बात नहीं होती
दिन गुज़रतें नहीं अब रात नहीं होती
इक बात कि तुम बिन ये दिल बेहाल है
तुम नहीं तो अब कुछ ऐसा हाल है

जैसे बिन चाँद-तारों की रात
जैसे दूल्हे बिना बारात
जैसे बिन गद्दी के राजा
जैसे कफ़न बिना जनाज़ा
जैसे बिन हिन्दी के हिन्द
जैसे धूप बिना आलिन्द
जैसे बिन साहिल के नदी
जैसे इतिहास बिना कोई सदी
जैसे बिन धड़कन के दिल
जैसे संगीत बिना महफ़िल
जैसे बिन प्यास के सजल
जैसे बहर बिना कोई ग़ज़ल
जैसे बिन मिलन के प्रीत
जैसे धुन बिना कोई गीत
जैसे बिन सिया के राम
जैसे राधा बिना घनश्याम
जैसे बिन मदन के रति
जैसे शिव बिना पार्वती
जैसे बिन पानी के मीन
जैसे फ़सल बिना ज़मीन
जैसे बिन बारिश के मोर
जैसे सूई बिना कोई डोर
जैसे बिन औषधि के चोट
जैसे लफ़्ज़ बिना ये होंठ

इक बात कि लबों पे कुछ बोल सजाने हैं
इक बात कि कुछ पल फिर संग बिताने हैं
इक बात कि तुम्हीं को फिर ख़्वाबों में तकना है
दिन-रात बस तुम्हें ही ख़यालों में रखना है
इक बात कि फिर तुम्हें सोच मुस्कुराना है
हर एक चेहरे में फिर तुम्हीं को पाना है
इक बात कि तुम से इक इनायत लेनी है
सात फेरों की तुम से इजाज़त लेनी है
इक बात कि तुम से फिर दिल लगाना है
तुम्हें फिर से अपना ख़ुदा बनाना है
इक बात कि तुम से सब शिकवे मिटाने हैं
फिर से तुम पर दो जहाँ लुटाने हैं
इक बात कि तुम्हारा फिर दिल धड़काना है
मुझे फिर तुम्हारे सपनों में आना है
इक बात कि तुम्हें दिल के जज़्बात बताने हैं
तुम्हारे साथ ही सातों जनम बिताने हैं
इक बात कि मिलने आओ गर तुम तो
साथ इक जनम भी निभाओ गर तुम तो

शीशे का इक आशियाँ बना दूँ
चादर फ़र्श पे मख़मली बिछा दूँ
आलम से बहारें चोरी कर लूँ
दोस्ती तितलियों से पूरी कर लूँ
मद्धम-सी कोई धुन चला दूँ
कलियाँ चारों ओर खिला दूँ
नदियों की चाल आहिस्ता कर दूँ
मुकम्मल साहिलों का रिश्ता कर दूँ
फ़िज़ाओं में ढेरों इत्र मिला दूँ
ख़ुशबूएँ हर तरफ़ फैला दूँ
शाम को देर तक ढलने न दूँ
मन पंछियों का मचलने न दूँ
बेवक़्त शबनम की बूँदें बरसा दूँ
पत्तियों के दिल की प्यास बुझा दूँ
हो अँधेरा तो शमा' रौशन कर दूँ
तेज़ परिंदों की धड़कन कर दूँ
चाँद को ज़मीं पे बुला दूँ
महफ़िल फूलों से सजा दूँ
आसमाँ से सितारें हज़ार ले लूँ
बारिश घटाओं से उधार ले लूँ
मौसम में नमी भर दूँ
चंचल-शीतल हवाएँ कर दूँ
फ़लक में सातों रंग घोल दूँ
चौखटें जन्नत की सारी खोल दूँ

इक बात कि तुम्हारे नाम जन्नतें सजानी हैं
इक बात कि तुम्हें अनगिनत ता'रीफ़ें सुनानी हैं
इक बात कि तुम्हारी बातों में नशा है
ज़ुल्फ़ें कि जैसे कोई काली घटा है
इक बात कि कितना मासूम है चेहरा
आँखों में छुपा हो राज़ कोई गहरा
इक बात कि कोई भी होश खो जाए
चाँद भी देखे तो दीवाना हो जाए
इक बात कि तुम्हें झुमकें पहनाने हैं
नाज़ुक-से हाथों पर कंगन चढ़ाने हैं
इक बात कि पैरों में पायलें बाँधनी हैं
अब इश्क़ की सारी दहलीज़ें लाँघनी हैं
इक बात कि तुम्हारी पलकों को चूमना है
संग तुम्हारे फिर से बारिशों में झूमना है
इक बात कि तुम्हें भरना है बाहों में
घंटों फिर यूँ ही रखना है निगाहों में
इक बात कि तुम से फिर बात करनी है
आओ कि फिर इक मुलाक़ात करनी है

— Rehaan

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