अफ़सोस
मुझे अफ़सोस है तुम को मोहब्बत हो गई मुझ से
ये क्या जादू हुआ है जो मैं क़ाबिल हो गया हूँ आज
तुम्हें तो कल शिकायत थी कि मुझ
में बस बुराई है
तुम्हें अब चाहिए दो ज़िन्दगी इक साथ में गुज़रे
तो कल क्यूँ सोचती थी तुम मोहब्बत इक तबाही है
ये क्या मतलब कि कल तक थी फ़क़त तुम को ग़लत-फ़हमी
ये तुम ने आज जाना है कि उल्फ़त में ही जन्नत है
मैं कैसे मान जाऊँ अब तुम्हारा इश्क़ सच्चा है
भला कैसे यक़ीं हो वाकई तुम को मोहब्बत है
वो दिल का टूटना मेरा कहो कैसे भुला दूँ मैं
कि इस बेज़ार दिल में अब कहाँ तुम को जगह दूँ मैं
सुनो ये मत समझना तुम कि मैं नाराज़ हूँ तुम से
न ही कुछ बात ऐसी है कि मुझ को तुम से नफ़रत है
न है तुम से कोई रंजिश न कोई चाह बदले की
मुझे तो आज भी तुम से सनम बेहद मोहब्बत है
मेरा हँसना-हँसाना भी फ़क़त बस है अदाकारी
अगर तुम आज भी चाहो मैं ख़ुद को ग़म-ज़दा कर लूँ
मेरी जो नज़्म है वो सब तुम्हारी मेहरबानी है
जो तुम इक मर्तबा कह दो क़लम तुम पर फ़ना कर दूँ
मेरी नज़रों में तुम अब भी ख़ुदा की वो ही मूरत हो
कि सूखे फूल खिल जाएँ तुम इतनी ख़ूब-सूरत हो
मगर वो आशिक़ी जो बस मिलन की शाख़ पे पनपे
मैं ऐसे उम्र भर के साथ से इनकार करता हूँ
मैं वो आशिक़ नहीं हूँ अब जिसे थी आरज़ू-ए-वस्ल
मैं तुम को हिज्र में भी ख़ुद से ज़्यादा प्यार करता हूँ
कभी सोचो सबब इस एक-तरफ़ा आशिक़ी का तो
तुम्हारी ही नज़र-अंदाज़ी की ये शुक्र-ए-नेमत है
यूँ शेर-ओ-शायरी ने इश्क़ के सब मायने बदले
कि तुम से इश्क़ है पर साथ रहने में अज़िय्यत है
बस इक एहसान कर दो मुझ से तुम नाराज़ हो जाओ
तुम्हें मेरी क़सम तुम फिर से ख़ुश-अंदाज़ हो जाओ
मुझे अफ़सोस है तुम को मोहब्बत हो गई मुझ से















