Rehaan
Rehaan
Ghazal

हर घड़ी बस इक तुझे ही देखना है सोचना है

हर घड़ी ये दिल मेरा तुझ से ही मिलने को फ़ना है

इल्तिजा है ये कि फिर से लौट आ तू पास मेरे
इक दफ़ा मुझ को भी शहज़ादी तेरा दिल तोड़ना है

ख़ुश-नसीबी है कि सबके सामने है फ़ैसला अब
सच तुझे भी बोलना है सच मुझे भी बोलना है

कोई मुझ को भी कहीं से ला दे अफ़्सूनी तराज़ू
कौन कितने साफ़ दिल का नापना है तौलना है

मेहरबानी सादगी रस्म-ए-वफ़ा नेकी शराफ़त
अब मुझे बेकार का ये सब झमेला छोड़ना है

क्या हया क्या शर्म पहला प्यार पूरा हो न पाया
दूसरा फिर तीसरा अब सब से रिश्ता जोड़ना है

एक खिड़की से न होगी ज़िन्दगी रौशन मेरी अब
अब मुझे हर एक खिड़की पर का पर्दा खोलना है

मुझ
में जो 'रेहान' है मुझ को बिगड़ने ही न देगा
मुझ
में जो 'रेहान' है उस का गला अब घोंटना है

— Rehaan

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