
मैं ग़म ढ़ेरों मोहब्बत के ख़ज़ाने से चुरा आया
जो पूरी हो नहीं सकती मुरादें वो उठा आया
इलाही हो गई कैसे बता मुझ से ख़ता ऐसी
मैं राहें तो सजा आया मगर मंज़िल भुला आया
— Rehaan
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