Rehaan
Rehaan
Ghazal

इल्तिजा तुम सेे ज़माने पर ज़रा एहसान करना

भूल कर भी तुम न ख़ुद को अब किसी की जान करना

ख़ुद-कुशी भी कर नहीं पाते हैं बेचारे ये आशिक़
फिर न तुम आगे किसी के वास्ते रमज़ान करना

एक ग़म ये है कि मुझ से क्यूँ नहीं मिलती हो अब तुम
एक डर है गर मिलो तो दिल न ये नुक़्सान करना

फिर वही काबा-ओ-काशी फिर वही वस्ल-ओ-जुदाई
दो दिलों को फिर न यूँ मज़लूम ऐ भगवान करना

बन सको मेरी कभी तुम रह गई ख़्वाहिश अधूरी
दूर जा मुझ से फ़क़त अब मुश्किलें आसान करना

है दुआ बस ये ख़ुदा फिर यूँ दिखा कर ख़्वाब झूठे
इश्क़ में फिर से न कोई ज़िंदगी शमशान करना

— Rehaan

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