Rehaan
Rehaan
Nazm

ग़लत-फ़हमी

भले दिनों की बात है
भला सा एक शहर था
ग़मों के उस दयार में
फ़लक से उतरी अप्सरा

थी शक्ल से बहार वो
गुलाब जैसे गाल थे
थी चाल उस की नदियों सी
कि रेशमी से बाल थे

अदब था उस
में इस-क़दर
कि शर्म भी हया करे
वो आए सज के सामने
तो चाँद भी गिला करे

वो जिस दिशा भी चल पड़े
हज़ार भॅंवरे हम-सफ़र
कि हर रक़ीब लड़ पड़े
वो देख ले पलट के गर

ग़मों के उस दयार से
ग़मों ने फिर विदा लिया
कि दिल-कशी सी छा गई
यूँ इश्क़ ने असर किया

ये उन दिनों की बात है
मैं बे-ख़बर था इश्क़ से
वो दोस्तों की दास्ताँ
मज़ाक़ थी मेरे लिए

मगर मेरे नसीब में
थीं बद-दुआएँ इश्क़ की
सो एक रोज़ यूँ हुआ
कि रू-ब-रू वो मिल गई

भली सी इक वो शाम थी
गुज़र रहा था मोड़ से
न जाने क्या सितम हुआ
कि आ गई वो सामने

नज़र से यूँ नज़र लड़ी
कि वक़्त जैसे खो गया
मैं क्या बताऊँ हाल-ए-दिल
कि इल्म-ए-इश्क़ हो गया

गली में उस की रात-दिन
यही बस एक काम था
कि उस के आशिक़ों में फिर
मेरा भी एक नाम था

पलट के उस को देखूँ मैं
तो खुल के मुस्कुराए वो
मैं भाने लग गया उसे
मुझे भी रास आए वो

ख़ुदा ने यूँ ग़ज़ब किया
कि बात होने लग गई
मैं शे'र कहने लग गया
वो ख़्वाब बोने लग गई

मगर हुआ ये इल्म फिर
कि हम थे इख़्तिलाफ़ में
मैं इश्क़ के ख़ुमार में
वो इश्क़ के ख़िलाफ़ में

थी उस को चश्म-ए-दोस्ती
मैं इश्क़ का नशा लिए
तो कोशिशें शुरू हुईं
कि रिश्ता ये बचा रहे

मगर है सच ये बात भी
कि कब तलक फ़िज़ूल में
यूँ इश्क़ के दरख़्त पे
ये दोस्ती के गुल खिलें

सो एक रोज़ क्या हुआ
कि बात इस-क़दर हुई
मैं इश्क़ पे अड़ा रहा
कि दोस्ती बिखर गई

मैं इश्क़ का दलाल था
वो दोस्ती को रब कहे
हर इक मेरी दलील को
वो जिस्म की तलब कहे

ये इश्क़-विश्क़ जाल है
कि मुझ को इनसे बख़्श दो
अगर क़ुबूल हो तुम्हें
तो दोस्ती के ख़त लिखो

है इश्क़ की तलब तुम्हें
मैं हूँ अलग मिज़ाज की
न शौक़ कुछ तबाही का
मैं लड़की काम-काज की

मैं दोस्ती निभाऊँगी
ख़ुदा की है क़सम मुझे
मगर जो ज़िद हो इश्क़ की
तो भूल जाओ तुम मुझे

न उस के दिल में इश्क़ था
न मेरे दिल में दोस्ती
मैं मोड़ पर खड़ा रहा
वो छोड़ कर चली गई

थी आँख नम अगर मेरी
उसे भी कुछ मलाल था
मिलेंगे फिर कभी न हम
ये उस को भी ख़याल था

सो यूँ हुआ कि फिर हमें
नसीब ने जुदा किया
वो दोस्त के बिना रही
मैं इश्क़ के बिना जिया

वो क्या ख़बर कहाँ गई
कि कुछ पता नहीं चला
मैं उस की याद में मगर
हज़ार शब जगा रहा

मैं अपने ग़म की दास्ताँ
सुनाता ही चला गया
सुख़न थे जो फ़िराक़ के
वो गाता ही चला गया

ये आजकल की बात है
हज़ार ग़म हैं सहने को
क़लम अगर उठाऊँ तो
न कुछ बचा है कहने को

न क़ाफ़िए बचे हैं कुछ
न कुछ रदीफ़ें रह गईं
थीं ग़ज़लें जो भी पास में
वो आँसुओं में बह गईं

है बहर की समझ कहाँ
जो नज़्म कोई कह सकूँ
है शा'इरी कि बेबसी
मैं क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ

सो अब कुछ ऐसा हाल है
कि कोई चारा-गर नहीं
भला हूँ या बुरा हूँ मैं
किसी को कुछ ख़बर नहीं

न अब किसी से इश्क़ है
न है किसी से दोस्ती
है उस की शक्ल ज़ेहन में
पता नहीं कभी-कभी

— Rehaan

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