निगाहों ने कभी कोई ख़िज़र नहीं देखा
सफ़र के ख़ब्त में शाम-ओ-सहर नहीं देखा
कहा था ग़ुस्से में घरवालों ने चले जाओ
मैं भी गया यूँ कि फिर लौट कर नहीं देखा
ये मुझ से अब मेरे घरवालों को शिकायत है
कि एक अर्सा हुआ मैं ने घर नहीं देखा
मैं लड़का बिगड़ा हुआ हूँ मगर बता रहा हूँ
कभी हवस से तुम्हें आँख-भर नहीं देखा
तुम्हारे फूल का काँटा यूँ चुभ गया मुझ को
कि मैं ने फिर कभी कोई शजर नहीं देखा
तुम्हारे बा'द मैं कुछ इस-क़दर परेशाँ हूँ
मुझे किसी ने कभी इस-क़दर नहीं देखा
मुझे तो एक तवायफ़ भी कल ये कह के गई
तुम्हारे जैसा कोई मुंतशर नहीं देखा
शराब का नशा सिगरेट की तलब 'रेहान'
किसी ने मुझ
में कभी ये हुनर नहीं देखा















