"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है"
बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है
फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं
कम हो रही हर एक मील की दूरी पे
अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं
दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा
पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं
छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का
ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं
मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को
अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं
रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है
सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं
बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है
फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं
बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है
फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं
बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे
तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं
रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई
जाने फिर क्यूँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं
मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से
फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं
कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ से ही रह गई होगी
तुझ से नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं
चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में
अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं
बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है
फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं















