दो जानिब
एक मैं हूँ एक तू है दोनों बड़े नादान हैं
तू मुझ से और मैं ख़ुद से दोनों ही अंजान हैं
तेरी गलियाँ स्वर्ग हैं जैसे मेरा शहर शमशान है
मैं शम्अ' कब से बुझा हुआ तुझ पर पतंगें क़ुर्बान हैं
ख़ुशियाँ तेरे क़दम चूमतीं ग़म मेरे मेहमान हैं
तुझ पर ख़ुदा फ़िदा है मुझ से घरवाले तक परेशान हैं
मुझे कि बस इक ख़्वाहिश तेरी तुझे कि सैकड़ों अरमान हैं
मेरी क़िस्मत में तू ही नहीं तुझ पर क़िस्मत मेहरबान है
मैं तेरे लिए कुछ भी नहीं तू मेरे लिए भगवान है
तेरे दिल में भले रेहान न हो तेरी ज़िन्दगी फिर भी रेहान है
— Rehaan















